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थलपति विजय की कुर्सी पर बढ़ा सियासी दबाव? लेफ्ट से बढ़ती दूरी ने तमिलनाडु की राजनीति में मचाई हलचल

By Aarti Mishra · Published 14 Sep 2026, 17:37 · Updated 14 Sep 2026, 17:37

अभिनेता से राजनेता बने और अब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के लिए सत्ता संभालने के कुछ ही महीनों बाद राजनीतिक चुनौतियां बढ़ती दिखाई दे रही हैं। विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम यानी TVK ने 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद गठबंधन सरकार बनाई थी। सरकार को कांग्रेस के साथ-साथ CPI और CPI(M) समेत कुछ दलों का समर्थन मिला था।

लेकिन अब सरकार और वामपंथी दलों के बीच रिश्तों में तनाव की खबरें सामने आ रही हैं। खासकर ऐसे सरकारी सर्कुलर को लेकर विवाद हुआ, जिसमें वामपंथी संगठनों से जुड़े छात्रों पर नजर रखने के निर्देश दिए जाने की बात सामने आई। CPI(M) ने इस मामले में सरकार से जवाब मांगा और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए।

हालांकि, यह कहना अभी सही नहीं होगा कि लेफ्ट पार्टियों ने विजय सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार CPI और CPI(M) अभी भी सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे हैं। असली सवाल यह है कि क्या यह समर्थन आगे भी उसी तरह जारी रहेगा या बढ़ता राजनीतिक मतभेद विजय सरकार के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है।

कैसे बनी थी विजय की सरकार?

2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव ने राज्य की दशकों पुरानी राजनीतिक तस्वीर बदल दी। TVK ने अपने पहले ही विधानसभा चुनाव में बड़ा प्रदर्शन किया और 234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के 118 के आंकड़े से कुछ सीटें कम रह गईं।

ऐसे में विजय को सरकार बनाने के लिए सहयोगी दलों की जरूरत पड़ी। कांग्रेस ने TVK का साथ दिया, जबकि CPI, CPI(M), VCK और IUML ने भी अलग-अलग तरीके से सरकार गठन में समर्थन दिया। CPI और CPI(M) ने साफ किया था कि वे सरकार में शामिल नहीं होंगे और बाहर से समर्थन देंगे।

यही व्यवस्था विजय सरकार की राजनीतिक मजबूती का आधार बनी। लेकिन बाहर से समर्थन देने वाले दलों के साथ रिश्ते हमेशा सरकार के फैसलों और नीतियों पर निर्भर रहते हैं।

लेफ्ट और विजय सरकार के बीच विवाद की शुरुआत कहां से हुई?

अगस्त 2026 में सरकार से जुड़े कुछ सर्कुलर सामने आने के बाद विवाद बढ़ गया। रिपोर्टों के अनुसार इन निर्देशों में अधिकारियों को वामपंथी संगठनों से जुड़े छात्रों और उनकी गतिविधियों पर नजर रखने को कहा गया था।

CPI(M) ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया। पार्टी ने सरकार से इस पूरे मामले की जांच कराने और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की। इसके साथ ही मुख्यमंत्री विजय से सीधे स्पष्टीकरण देने की मांग भी की गई।

वामपंथी दलों का सवाल था कि अगर सरकार उन्हें समर्थन देने वाले दलों की राजनीतिक गतिविधियों को ही निगरानी के दायरे में रखती है, तो फिर सरकार और लेफ्ट के बीच विश्वास कैसे बना रहेगा?

यही मुद्दा अब विजय सरकार के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन गया है।

क्या लेफ्ट ने विजय का साथ छोड़ दिया?

यह सवाल इस समय सबसे ज्यादा चर्चा में है, लेकिन इसका जवाब फिलहाल नहीं है।

CPI और CPI(M) ने सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा नहीं की है। दोनों दल सरकार को बाहर से समर्थन देने की अपनी स्थिति पर कायम हैं। सितंबर की शुरुआत में भी इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने दोनों पार्टियों को TVK सरकार का बाहरी समर्थन करने वाली पार्टियों के रूप में बताया था।

लेकिन राजनीतिक तस्वीर में एक महत्वपूर्ण बदलाव जरूर आया है।

विजय की ओर से सहयोगी दलों को लेकर बैठकों का आयोजन किया गया, लेकिन CPI और CPI(M) ने इन बैठकों से दूरी बनाए रखी। लेफ्ट ने खुद को सरकार का हिस्सा या औपचारिक गठबंधन सहयोगी मानने के बजाय बाहर से समर्थन देने की स्थिति को बरकरार रखा है।

यानी समर्थन खत्म नहीं हुआ है, लेकिन रिश्तों में खटास जरूर बढ़ी है।

विजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

विजय के सामने चुनौती केवल बहुमत की संख्या बनाए रखने की नहीं है। उनकी सरकार को अलग-अलग विचारधारा वाले सहयोगी दलों को साथ लेकर चलना है।

कांग्रेस सरकार में साझेदार है, जबकि VCK, IUML और अन्य दलों के साथ अलग राजनीतिक समीकरण हैं। दूसरी तरफ CPI और CPI(M) बाहर से समर्थन दे रहे हैं।

ऐसे में मुख्यमंत्री के लिए हर सरकारी फैसला राजनीतिक संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण हो जाता है।

अगर लेफ्ट के साथ मतभेद बढ़ते हैं तो विपक्षी दल इसे विजय सरकार की कमजोरी के रूप में पेश कर सकते हैं। हालांकि, फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है कि सरकार बहुमत खोने की स्थिति में पहुंच गई है।

नई गठबंधन राजनीति में भी दिखी लेफ्ट की दूरी

हाल ही में विजय के नेतृत्व वाले गठबंधन को “Secular Social Justice Victory Alliance” नाम दिया गया। इस गठबंधन में कांग्रेस समेत कई सहयोगी दलों की भूमिका दिखाई दी, लेकिन CPI और CPI(M) के नेता उस बैठक में शामिल नहीं हुए। रिपोर्टों के अनुसार दोनों वाम दल सरकार को बाहर से समर्थन देने की अपनी स्थिति पर कायम हैं।

यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विजय सरकार अभी नई है और गठबंधन की राजनीतिक संरचना भी पूरी तरह स्थिर नहीं हुई है।

एक तरफ सरकार अपने सहयोगियों को एक साझा मंच पर लाने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ लेफ्ट अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और नीतिगत रुख को बनाए रखना चाहता है।

क्या इससे मुख्यमंत्री विजय की कुर्सी खतरे में है?

फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगा कि विजय की मुख्यमंत्री की कुर्सी सीधे खतरे में है।

विजय सरकार के पास कांग्रेस समेत सहयोगियों का समर्थन है और CPI तथा CPI(M) ने भी समर्थन वापस लेने की घोषणा नहीं की है। इसलिए मौजूदा स्थिति को सरकार गिरने के तत्काल खतरे के बजाय गठबंधन के भीतर बढ़ते मतभेद और राजनीतिक दबाव के रूप में देखना ज्यादा सही होगा।

लेकिन राजनीति में संख्या के साथ-साथ सहयोगियों का विश्वास भी महत्वपूर्ण होता है। अगर आने वाले समय में लेफ्ट का रुख और कठोर होता है और दूसरे सहयोगी दल भी सरकार के फैसलों पर सवाल उठाने लगते हैं, तो विजय के लिए स्थिति मुश्किल हो सकती है।

यही वजह है कि आने वाले दिनों में मुख्यमंत्री विजय की नजर केवल विपक्ष पर नहीं, बल्कि अपने समर्थन देने वाले दलों के रुख पर भी होगी।

विजय के लिए यह सिर्फ सरकार नहीं, राजनीतिक परीक्षा भी है

थलपति विजय ने सिनेमा से राजनीति में प्रवेश करते समय तमिलनाडु की पारंपरिक राजनीति को चुनौती देने का दावा किया था। 2026 के चुनाव में TVK का प्रदर्शन इस दावे को राजनीतिक ताकत में बदलने में सफल रहा।

लेकिन चुनाव जीतना और गठबंधन सरकार चलाना दो अलग-अलग चुनौतियां हैं।

विजय के सामने अब प्रशासन चलाने के साथ-साथ अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों को साथ रखने की परीक्षा है। लेफ्ट के साथ मौजूदा विवाद इसी बड़ी चुनौती का हिस्सा है।

खास बात यह है कि CPI और CPI(M) अभी सरकार के खिलाफ खुली बगावत की स्थिति में नहीं हैं। वे बाहर से समर्थन दे रहे हैं, लेकिन सरकारी नीतियों और प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठाने से पीछे भी नहीं हट रहे।

इसलिए फिलहाल तस्वीर को “लेफ्ट ने विजय का साथ छोड़ दिया” कहना सही नहीं होगा। ज्यादा सटीक तस्वीर यह है कि विजय सरकार और लेफ्ट के बीच भरोसे की परीक्षा चल रही है।

आने वाले दिनों में अगर सरकार विवादित सर्कुलर और दूसरे मुद्दों पर लेफ्ट को संतुष्ट करने में सफल होती है तो यह तनाव कम हो सकता है। लेकिन अगर मतभेद लगातार बढ़ते रहे, तो यही बाहरी समर्थन भविष्य में विजय सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है।

तमिलनाडु की राजनीति में विजय ने एक नया अध्याय जरूर शुरू किया है, लेकिन अब असली परीक्षा यह है कि वह सत्ता के इस नए समीकरण को कितनी मजबूती से संभाल पाते हैं।