पुराने Diesel Truck और Bus के लिए बड़ी खबर, ₹5,000 का डिवाइस प्रदूषण 90% तक करेगा कम
देश में बढ़ते वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार लगातार नए कदम उठा रही है। इसी बीच पुराने डीजल ट्रक और बस चलाने वालों के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है। सरकार अब ऐसे पुराने और ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों में एक खास Retrofit Emission Control Device (RECD) लगाने की अनुमति…
देश में बढ़ते वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार लगातार नए कदम उठा रही है। इसी बीच पुराने डीजल ट्रक और बस चलाने वालों के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है। सरकार अब ऐसे पुराने और ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों में एक खास Retrofit Emission Control Device (RECD) लगाने की अनुमति देने की तैयारी कर रही है।
इस डिवाइस को IIT Delhi की एक तकनीकी पहल से विकसित किया गया है और इसकी कीमत करीब ₹4,000 से ₹5,000 बताई जा रही है। सरकार के मुताबिक, यह डिवाइस पुराने डीजल वाहनों से निकलने वाले particulate matter यानी बारीक प्रदूषण कणों को 90 प्रतिशत तक कम कर सकता है। इसके अलावा nitrogen oxide यानी NOx उत्सर्जन में भी करीब 60 प्रतिशत तक कमी आने का दावा किया गया है।
पुराने डीजल वाहनों के लिए क्यों खास है यह डिवाइस?
भारत में बड़ी संख्या में पुराने ट्रक और बस अभी भी सड़कों पर चलते हैं। इनमें से कई वाहन नए BS-VI उत्सर्जन मानकों के आने से पहले के हैं। ऐसे वाहन नए वाहनों की तुलना में ज्यादा प्रदूषण फैला सकते हैं।
सरकार पहले से ही पुराने वाहनों को हटाकर नए BS-VI या इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है। लेकिन हर वाहन मालिक के लिए तुरंत नया ट्रक या बस खरीदना आसान नहीं है।
यही वजह है कि retrofit technology को एक अतिरिक्त विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। इसके तहत पुराने वाहन को पूरी तरह बदलने के बजाय उसमें emission-control device लगाया जा सकता है।
₹4,000-5,000 में क्या मिलेगा फायदा?
इस योजना की सबसे खास बात इसकी संभावित कम कीमत है। रिपोर्ट के अनुसार डिवाइस की कीमत करीब ₹4,000 से ₹5,000 हो सकती है।
अगर कोई पुराना डीजल ट्रक या बस केवल प्रदूषण नियंत्रण के लिए बदलना चाहता है, तो नया वाहन खरीदने की तुलना में retrofit device काफी सस्ता विकल्प हो सकता है।
हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि अंतिम कीमत, फिटमेंट चार्ज और अन्य खर्च सरकार की अंतिम व्यवस्था और बाजार में उपलब्धता पर निर्भर करेंगे।
BS-III और BS-IV वाहनों में लगाया जा सकेगा
रिपोर्ट के मुताबिक यह डिवाइस BS-III, BS-IV और उससे पुराने डीजल वाहनों में लगाया जा सकता है। परीक्षण के दौरान BS-IV वाहन में retrofit device लगाने के बाद उसके emissions को BS-VI स्तर के करीब लाने की बात कही गई है।
इसका मतलब यह नहीं है कि पुराना वाहन तकनीकी रूप से नया BS-VI वाहन बन जाएगा। इसका उद्देश्य मुख्य रूप से वाहन से निकलने वाले प्रदूषक उत्सर्जन को कम करना है।
यही कारण है कि इस तकनीक को पुराने commercial vehicles के लिए एक वैकल्पिक समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
प्रदूषण में कितनी कमी आएगी?
सरकार की ओर से बताई गई जानकारी के अनुसार retrofit emission-control device particulate matter emissions को 90 प्रतिशत तक कम कर सकता है।
Particulate matter यानी PM में बहुत छोटे प्रदूषण कण शामिल होते हैं, जो हवा की गुणवत्ता को खराब करते हैं। इनका ज्यादा स्तर शहरों में pollution की समस्या को बढ़ा सकता है।
इसके अलावा इस तकनीक से nitrogen oxide यानी NOx emissions में 60 प्रतिशत तक कमी आने की बात कही गई है।
हालांकि “90 प्रतिशत तक” अधिकतम क्षमता को दर्शाता है। वास्तविक परिणाम वाहन की स्थिति, डिवाइस, इंजन और इस्तेमाल जैसी कई चीजों पर निर्भर कर सकते हैं।
सरकार ने क्यों लिया यह फैसला?
पुराने heavy vehicles से होने वाले प्रदूषण को कम करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। एक तरफ पुराने वाहनों को हटाकर नए वाहनों में बदलने की जरूरत है, वहीं दूसरी तरफ लाखों रुपये की कीमत वाले commercial vehicles को तुरंत बदलना वाहन मालिकों के लिए मुश्किल हो सकता है।
इसी समस्या को देखते हुए सरकार एक तरफ vehicle scrappage और replacement programme पर काम कर रही है, वहीं दूसरी तरफ retrofit technology को भी विकल्प के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है।
Delhi-NCR में पुराने ट्रकों और बसों को cleaner vehicles से बदलने के लिए PARIVARTAN Scheme भी चल रही है। इस योजना का कुल financial outlay ₹9,585 करोड़ है और इसका लक्ष्य BS-IV या उससे पुराने मानकों वाले 2 लाख से ज्यादा trucks और buses को BS-VI या electric vehicles से बदलने में मदद करना है।
नया वाहन खरीदना या retrofit device लगाना?
अब सवाल यह है कि पुराने वाहन मालिक के लिए बेहतर विकल्प क्या होगा—नया वाहन खरीदना या retrofit device लगाना?
इसका जवाब हर वाहन के लिए अलग हो सकता है।
अगर वाहन बहुत पुराना है और उसकी maintenance cost लगातार बढ़ रही है, तो नया वाहन खरीदना लंबे समय में बेहतर विकल्प हो सकता है।
लेकिन अगर वाहन अभी अच्छी स्थिति में है और केवल emissions को कम करने की जरूरत है, तो approved retrofit device एक सस्ता विकल्प हो सकता है।
सरकार का नया कदम इसी तरह के विकल्प उपलब्ध कराने की दिशा में देखा जा रहा है।
AIS-228 Standard भी महत्वपूर्ण
इस पूरी व्यवस्था में AIS-228 standard की भूमिका महत्वपूर्ण है। सरकार retrofit emission-control devices के लिए technical specifications और performance requirements तय करने की दिशा में काम कर रही है।
इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि बाजार में आने वाले devices तय मानकों के अनुसार काम करें और उनकी performance की जांच हो।
इससे वाहन मालिकों को भी सही और प्रमाणित technology चुनने में मदद मिल सकती है।
क्या हर पुराने वाहन में तुरंत लग जाएगा डिवाइस?
नहीं। अभी इसे लेकर सबसे जरूरी बात यही है कि सरकार की अनुमति और final rollout process का इंतजार करना होगा।
किसी भी vehicle owner को केवल खबर देखकर बाजार से कोई भी emission-control device खरीदकर अपने वाहन में नहीं लगाना चाहिए। जब सरकार की ओर से final rules और approved products की जानकारी सामने आए, तभी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार retrofit कराना बेहतर होगा।
यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि वाहन में किसी तरह का alteration संबंधित technical और regulatory requirements के अनुसार होना चाहिए।
प्रदूषण कम करने में कितनी मदद मिलेगी?
अगर यह technology बड़े स्तर पर सफल रहती है और पुराने heavy vehicles में सही तरीके से लगाई जाती है, तो इससे सड़कों पर चलने वाले पुराने डीजल वाहनों के emissions को कम करने में मदद मिल सकती है।
खासकर बड़े शहरों और pollution-prone क्षेत्रों में पुराने trucks और buses से निकलने वाले emissions को नियंत्रित करना काफी महत्वपूर्ण है।
हालांकि केवल एक device से देश की pollution problem खत्म नहीं होगी। इसके साथ public transport को मजबूत करना, cleaner fuels को बढ़ावा देना, पुराने वाहनों को replace करना और emission rules को सही तरीके से लागू करना भी जरूरी होगा।
आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
इस फैसले का असर केवल ट्रक और बस मालिकों तक सीमित नहीं रहेगा। अगर पुराने commercial vehicles से pollution कम होता है तो लंबे समय में शहरों की air quality सुधारने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा अगर कम कीमत में approved technology उपलब्ध होती है, तो vehicle owners के लिए भी compliance आसान हो सकता है।
लेकिन इस योजना का वास्तविक असर तब साफ होगा जब सरकार rollout की पूरी प्रक्रिया, eligibility, approved devices और implementation timeline स्पष्ट करेगी।
पुराने डीजल ट्रकों और बसों से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार का यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। IIT Delhi की तकनीक पर आधारित करीब ₹4,000-5,000 का retrofit device पुराने BS-III, BS-IV और उससे पुराने डीजल वाहनों के emissions को कम करने में मदद कर सकता है।
सरकार के अनुसार इससे particulate matter pollution को 90 प्रतिशत तक और NOx emissions को 60 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।
अब सबसे ज्यादा नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार इस technology को कब और किस तरीके से बड़े स्तर पर लागू करती है। अगर rollout सही तरीके से होता है, तो पुराने commercial vehicles को तुरंत हटाए बिना उनके pollution levels को कम करने की दिशा में यह एक उपयोगी विकल्प साबित हो सकता है।
