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जितिया व्रत 2026 कब है? जानें पूजा, व्रत कथा और महाभारत से जुड़ी मान्यता

By Aarti Mishra · Published 24 Sep 2026, 00:30 · Updated 24 Sep 2026, 00:30

जितिया व्रत 2026: संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से रखा जाने वाला जितिया व्रत हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण व्रतों में शामिल है। इसे जीवित्पुत्रिका व्रत और कई जगह जिउतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है। बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश समेत कई इलाकों में इस व्रत को लेकर विशेष धार्मिक आस्था है।

इस दिन माताएं अपनी संतान की खुशहाली और दीर्घायु की कामना करते हुए व्रत रखती हैं। जितिया व्रत से जुड़ी परंपराओं में नहाय-खाय, निर्जला उपवास, पूजा, व्रत कथा और पारण का विशेष महत्व माना जाता है।

जितिया व्रत 2026 कब रखा जाएगा?

जितिया व्रत 2026 में 3 अक्टूबर, शनिवार को रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार यह व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। 2026 में अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर को सुबह 7:59 बजे शुरू होगी और 4 अक्टूबर को सुबह 5:51 बजे समाप्त होगी।

इस वजह से जितिया व्रत की तारीख को लेकर कहीं-कहीं 3 और 4 अक्टूबर का उल्लेख देखने को मिल सकता है। व्रत रखने वाली महिलाओं को अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा और पारण का समय देखना चाहिए।

जितिया व्रत 2026 की मुख्य जानकारी:

  • व्रत की तारीख: 3 अक्टूबर 2026, शनिवार
  • पक्ष: आश्विन कृष्ण पक्ष
  • तिथि: अष्टमी
  • अष्टमी प्रारंभ: 3 अक्टूबर, सुबह 7:59 बजे
  • अष्टमी समाप्त: 4 अक्टूबर, सुबह 5:51 बजे
  • व्रत का प्रमुख उद्देश्य: संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना

जितिया व्रत क्यों रखा जाता है?

जितिया व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाल जीवन की कामना से रखती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत में संयम और श्रद्धा का विशेष महत्व है।

कई क्षेत्रों में महिलाएं इस दौरान निर्जला उपवास रखती हैं। यानी व्रत के दौरान पानी तक ग्रहण नहीं किया जाता। इसी कारण इसे कठिन व्रतों में गिना जाता है।

हालांकि हर व्यक्ति के लिए निर्जला उपवास उचित नहीं हो सकता। स्वास्थ्य संबंधी समस्या, गर्भावस्था या किसी बीमारी की स्थिति में उपवास रखने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है।

जितिया व्रत में किसकी पूजा होती है?

अब सबसे बड़ा सवाल—जितिया व्रत में किसकी पूजा की जाती है?

जितिया व्रत की प्रमुख कथा राजा जीमूतवाहन से जुड़ी है। धार्मिक परंपरा में जीमूतवाहन को त्याग, दया और मानवता का प्रतीक माना जाता है।

जितिया की व्रत कथा में राजा जीमूतवाहन, पक्षीराज गरुड़ और नागपुत्र शंखचूड़ का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार जीमूतवाहन ने शंखचूड़ नामक नाग की रक्षा के लिए अपना जीवन तक दांव पर लगा दिया था। उनके त्याग और करुणा से प्रभावित होकर गरुड़ ने नागों को अभय दिया।

इसी वजह से जितिया व्रत में राजा जीमूतवाहन की कथा सुनने और उनकी पूजा करने की परंपरा को विशेष महत्व दिया जाता है।

महाभारत काल से कैसे जुड़ा है जितिया व्रत?

जितिया व्रत को लेकर महाभारत से जुड़ी एक धार्मिक मान्यता भी सुनने को मिलती है। इसके अनुसार महाभारत युद्ध के बाद अश्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को नुकसान पहुंचाने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था।

धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने गर्भ में पल रहे उस बच्चे की रक्षा की। बाद में यही बच्चा परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इसी कथा को कई लोग संतान की रक्षा और जीवन से जुड़े जितिया व्रत के भाव से जोड़ते हैं। हालांकि इसे धार्मिक मान्यता और कथा-परंपरा के रूप में ही समझना चाहिए। जितिया व्रत की प्रमुख व्रत कथा राजा जीमूतवाहन से जुड़ी मानी जाती है।

नहाय-खाय से शुरू होती है जितिया की तैयारी

जितिया व्रत के आसपास कई पारंपरिक रस्में होती हैं। कई क्षेत्रों में व्रत से पहले नहाय-खाय की परंपरा निभाई जाती है।

इस दिन महिलाएं स्नान करके पूजा करती हैं और सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। इसके बाद अगले चरण में व्रत की तैयारी शुरू होती है।

बिहार और आसपास के क्षेत्रों में जितिया से जुड़ी स्थानीय परंपराओं में थोड़ा अंतर भी देखने को मिलता है। इसलिए हर परिवार में इसकी विधि बिल्कुल एक जैसी हो, यह जरूरी नहीं है।

जितिया व्रत की सबसे खास बात है निर्जला उपवास

जितिया व्रत की सबसे कठिन परंपरा इसका निर्जला उपवास है। धार्मिक मान्यता के अनुसार व्रती महिलाएं संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना से पूरे दिन और रात उपवास रखती हैं।

यह व्रत मातृत्व प्रेम, त्याग और संतान के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

इसी वजह से जितिया का दिन कई परिवारों में भावनात्मक रूप से भी खास होता है। महिलाएं पूजा-पाठ के साथ व्रत कथा सुनती हैं और परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं।

चील और सियारिन की कथा भी है प्रसिद्ध

जितिया व्रत में चील और सियारिन से जुड़ी लोककथा भी सुनाई जाती है। यह कथा खासकर बिहार और आसपास के क्षेत्रों की लोकपरंपराओं में लोकप्रिय है।

कथा के माध्यम से व्रत के नियम, संयम और श्रद्धा का महत्व बताया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस लोककथा को सुनाने का तरीका और विवरण थोड़ा अलग हो सकता है।

यही वजह है कि जितिया केवल एक धार्मिक उपवास नहीं, बल्कि लोकपरंपरा और पारिवारिक संस्कारों से जुड़ा पर्व भी माना जाता है।

जितिया व्रत का पारण कब होता है?

जितिया व्रत के बाद पारण किया जाता है। पारण का सही समय स्थानीय पंचांग में तिथि और सूर्योदय की गणना के आधार पर देखा जाता है।

इसलिए इंटरनेट पर किसी दूसरे शहर के पारण समय को देखकर व्रत न खोलें। अपने शहर के पंचांग में दिए गए समय को प्राथमिकता देना बेहतर रहता है।

बिहार और झारखंड में खास है जितिया की रौनक

जितिया व्रत बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में विशेष रूप से मनाया जाता है। नेपाल में भी यह व्रत लोकप्रिय है।

बिहार के गांवों और शहरों में इस मौके पर महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा करती हैं और जितिया की कथा सुनती हैं। कई परिवारों में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।

यही वजह है कि जितिया सिर्फ धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि परिवार और समाज को जोड़ने वाली परंपरा के रूप में भी देखा जाता है।

आस्था, त्याग और संतान की लंबी उम्र से जुड़ा है व्रत

जितिया व्रत की सबसे बड़ी खासियत इसके पीछे छिपी आस्था है। एक तरफ राजा जीमूतवाहन की कथा त्याग और दया का संदेश देती है, तो दूसरी तरफ संतान की सुरक्षा और लंबी उम्र की कामना इस व्रत को मातृत्व से जोड़ती है।

जितिया व्रत 2026 में 3 अक्टूबर को रखा जाएगा। इस दिन महिलाएं परंपरा के अनुसार पूजा, व्रत कथा और धार्मिक अनुष्ठान करती हैं। व्रत और पारण के समय में स्थानीय अंतर संभव है, इसलिए अंतिम समय अपने क्षेत्र के पंचांग से जरूर जांच लें।