नोएल टाटा क्यों कर रहे हैं एन चंद्रशेखरन की वापसी का विरोध? Tata Sons में क्यों बढ़ा विवाद

Tata Sons leadership row: Noel Tata opposes N Chandrasekaran’s second term.
टाटा समूह, जिसे देश के सबसे बड़े और भरोसेमंद कारोबारी समूहों में गिना जाता है, इन दिनों अपने नेतृत्व को लेकर चर्चा में है। टाटा संस के बोर्ड ने मौजूदा चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को एक और पांच साल का कार्यकाल देने का फैसला किया है। लेकिन इस फैसले पर टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने आपत्ति जताई है।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर नोएल टाटा चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के खिलाफ क्यों हैं? इसके पीछे सिर्फ चेयरमैन पद का मामला है या टाटा समूह की भविष्य की रणनीति भी इससे जुड़ी है?
चंद्रशेखरन ने पहले क्या कहा था?
एन चंद्रशेखरन काफी समय से टाटा संस की कमान संभाल रहे हैं। उनके मौजूदा कार्यकाल की अवधि फरवरी 2027 में पूरी होने वाली है।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अगस्त 2026 में चंद्रशेखरन ने बोर्ड को बताया था कि वह अपना मौजूदा कार्यकाल खत्म होने के बाद चेयरमैन पद पर बने रहने के लिए अपना नाम आगे नहीं बढ़ाना चाहते। इसके बाद नए चेयरमैन की तलाश को लेकर प्रक्रिया शुरू करने की बात सामने आई थी।
लेकिन कुछ समय बाद स्थिति बदल गई। 17 सितंबर 2026 को टाटा संस के बोर्ड ने चंद्रशेखरन को पांच साल का एक और कार्यकाल देने का प्रस्ताव मंजूर कर लिया। इस प्रस्ताव के पक्ष में बोर्ड के ज्यादातर सदस्यों ने वोट किया, जबकि नोएल टाटा ने इसका विरोध किया।
नोएल टाटा की सबसे बड़ी आपत्ति क्या है?
नोएल टाटा की आपत्ति का एक बड़ा कारण फैसले में बदलाव और प्रक्रिया बताया जा रहा है।
उनका कहना है कि जब चंद्रशेखरन खुद अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद पद छोड़ने की बात कह चुके थे और टाटा ट्रस्ट्स ने भी इस फैसले को स्वीकार कर लिया था, तो उसके बाद अचानक दोबारा पांच साल के कार्यकाल का प्रस्ताव क्यों लाया गया?
नोएल टाटा के अनुसार, चंद्रशेखरन के पहले फैसले के आधार पर कर्मचारियों, निवेशकों और कारोबारी साझेदारों के बीच आगे के नेतृत्व को लेकर एक स्थिति बन चुकी थी। इसलिए उनके मुताबिक अब नए उत्तराधिकारी की तलाश की प्रक्रिया आगे बढ़नी चाहिए।
Tata Sons के नियम भी बने विवाद की वजह
इस मामले में टाटा संस के Articles of Association यानी कंपनी के आंतरिक नियम भी काफी महत्वपूर्ण हैं।
टाटा ट्रस्ट्स का Tata Sons में बड़ा हिस्सा है और चेयरमैन की नियुक्ति से जुड़े कुछ विशेष अधिकार और प्रक्रियाएं कंपनी के नियमों में तय हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रस्ट्स का मानना है कि चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के लिए जरूरी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठते हैं।
नोएल टाटा ने इस मामले में एक कानूनी राय का भी हवाला दिया है। हालांकि इस पूरे विवाद में अंतिम कानूनी स्थिति संबंधित संस्थाओं और जरूरत पड़ने पर कानूनी प्रक्रिया के जरिए ही स्पष्ट होगी।
यानी मामला सिर्फ यह नहीं है कि चंद्रशेखरन को चेयरमैन बनाया जाए या नहीं। सवाल यह भी है कि नियुक्ति किस प्रक्रिया से होनी चाहिए और Tata Sons के नियमों की व्याख्या कैसे की जाए।
बिजनेस रणनीति को लेकर भी मतभेद
नोएल टाटा और चंद्रशेखरन के बीच मतभेदों की चर्चा सिर्फ चेयरमैन पद तक सीमित नहीं रही है।
टाटा समूह ने पिछले कुछ वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक्स, डिजिटल बिजनेस, एयरलाइन और दूसरे नए क्षेत्रों में बड़े निवेश किए हैं। इनमें Air India, Tata Electronics और Tata Digital जैसे कारोबार शामिल हैं।
इन कारोबारों में भविष्य की संभावनाओं के साथ-साथ शुरुआती दौर में बड़े खर्च और घाटे की भी चर्चा रही है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, समूह की कुछ नई कंपनियों के प्रदर्शन और उनमें किए जा रहे पूंजी निवेश को लेकर सवाल उठाए गए थे।
इससे टाटा समूह की भविष्य की बिजनेस रणनीति को लेकर अलग-अलग राय सामने आने की बात कही गई है।
Air India और दूसरे नए कारोबार भी चर्चा में
टाटा समूह ने Air India को फिर से अपने कारोबारी समूह का हिस्सा बनाया और इसके विस्तार पर बड़ा निवेश किया है। इसी तरह Tata Electronics को सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
इन योजनाओं को टाटा समूह के लंबे समय के विस्तार से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन बड़े निवेश के साथ खर्च और घाटे को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
यही कारण है कि टाटा संस में नेतृत्व का मुद्दा अब सिर्फ एक व्यक्ति की नियुक्ति तक सीमित नहीं दिखता। इसके साथ समूह की पूंजी, निवेश और भविष्य की बिजनेस दिशा भी जुड़ी हुई है।
Tata Sons की लिस्टिंग भी अहम मुद्दा
इस पूरे विवाद के बीच Tata Sons की संभावित शेयर बाजार लिस्टिंग भी एक बड़ा मुद्दा है।
रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक ने Tata Sons के Core Investment Company से बाहर निकलने के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद Tata Sons की लिस्टिंग और उससे जुड़े नियामकीय नियमों पर चर्चा तेज हुई।
17 सितंबर को बोर्ड की बैठक में चंद्रशेखरन के नए कार्यकाल के साथ कंपनी की लिस्टिंग से जुड़े मुद्दे पर भी फैसले की रिपोर्ट सामने आई।
Tata Trusts और Tata Sons के बीच इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग विचार होने की खबरें भी पहले सामने आ चुकी हैं। इसलिए चेयरमैन की नियुक्ति का विवाद कंपनी के व्यापक कॉरपोरेट गवर्नेंस से भी जुड़ गया है।
आगे क्या होगा?
बोर्ड द्वारा चंद्रशेखरन के नए कार्यकाल को मंजूरी मिलने के बावजूद मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इस फैसले को आगे शेयरधारकों की मंजूरी की जरूरत होगी। Tata Trusts की Tata Sons में बड़ी हिस्सेदारी है, इसलिए उसकी भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहेगी।
दूसरी तरफ नोएल टाटा की तरफ से नए उत्तराधिकारी की तलाश की बात सामने आई है। ऐसे में आने वाले समय में बोर्ड, Tata Trusts और शेयरधारकों के बीच इस मुद्दे पर आगे चर्चा हो सकती है।
आखिर क्यों हो रहा है इतना बड़ा विवाद?
पूरे मामले को आसान भाषा में समझें तो विवाद के पीछे मुख्य रूप से तीन बातें दिखाई देती हैं।
पहली, चंद्रशेखरन ने पहले अपना मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद पद छोड़ने की बात कही थी, लेकिन बाद में उन्हें एक और कार्यकाल देने का प्रस्ताव आया।
दूसरी, Tata Sons के आंतरिक नियमों और चेयरमैन की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे हैं।
तीसरी, टाटा समूह के बड़े निवेश, नए कारोबारों की रणनीति और Tata Sons की संभावित लिस्टिंग जैसे मुद्दों पर भी अलग-अलग विचार सामने आए हैं।
फिलहाल Tata Sons के बोर्ड ने चंद्रशेखरन को एक और पांच साल का कार्यकाल देने का फैसला किया है, जबकि नोएल टाटा ने इसका विरोध किया है। अब आगे शेयरधारकों की मंजूरी और संबंधित कॉरपोरेट प्रक्रियाएं इस पूरे मामले की दिशा तय करेंगी।