ज्ञानेश कुमार को हटाना इतना आसान नहीं! नोटिस से राष्ट्रपति के आदेश तक, ऐसा है CEC को हटाने का पूरा प्रोसेस

भारत में चुनाव कराने वाली सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाओं में भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) का नाम सबसे ऊपर आता है। इसी आयोग का नेतृत्व मुख्य चुनाव आयुक्त यानी Chief Election Commissioner (CEC) करता है। मौजूदा CEC ज्ञानेश कुमार हैं, जिन्होंने 19 फरवरी 2025 को देश के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यभार संभाला था।
हालांकि CEC के खिलाफ कार्रवाई या उन्हें पद से हटाने की बात सामने आए तो यह समझना जरूरी है कि उन्हें किसी सामान्य सरकारी अधिकारी की तरह सीधे आदेश देकर हटाया नहीं जा सकता। संविधान ने CEC के पद को विशेष सुरक्षा दी है। Article 324(5) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरीके और आधार पर सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाया जाता है।
यही वजह है कि CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने की प्रक्रिया लंबी और कई संवैधानिक चरणों वाली है।
मार्च 2026 में क्या हुआ था?
मार्च 2026 में ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर संसद में नोटिस दिए गए थे। लोकसभा में दिए गए नोटिस पर 130 सांसदों के हस्ताक्षर थे, जबकि राज्यसभा में 63 सांसदों ने नोटिस पर हस्ताक्षर किए थे। ये नोटिस Article 324(5), Article 124(4), 2023 के CEC कानून और Judges (Inquiry) Act, 1968 के प्रावधानों के तहत दिए गए थे।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। केवल पर्याप्त सांसदों के हस्ताक्षर कर देने से CEC अपने आप पद से नहीं हटते। यह सिर्फ प्रक्रिया शुरू करने की दिशा में एक कदम होता है।
6 अप्रैल 2026 को लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने इन नोटिसों को स्वीकार नहीं किया। लोकसभा सचिवालय के आधिकारिक बुलेटिन के अनुसार, 12 मार्च 2026 के नोटिस को लोकसभा अध्यक्ष ने Judges (Inquiry) Act की धारा 3 के तहत स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
अब सवाल है कि अगर नोटिस स्वीकार हो जाता, तो आगे क्या होता?
CEC को हटाने की संवैधानिक सुरक्षा क्या है?
भारतीय संविधान के Article 324 में Election Commission से संबंधित प्रावधान हैं। इसके तहत चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण Election Commission को दिया गया है। इसी Article 324(5) में CEC को हटाने के लिए विशेष सुरक्षा का प्रावधान है।
Election Commission की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक CEC का कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो पहले हो, निर्धारित है। लेकिन कार्यकाल पूरा होने से पहले CEC को हटाने के लिए सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया लागू नहीं होती।
यानी सरकार या कोई मंत्री अकेले CEC को हटाने का आदेश नहीं दे सकता।
पहला चरण: सांसदों की ओर से Removal Notice
CEC को हटाने की प्रक्रिया का पहला महत्वपूर्ण चरण संसद में Removal Motion का Notice देना है।
Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत यदि लोकसभा में नोटिस दिया जाता है तो उस पर कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए। वहीं राज्यसभा में नोटिस के लिए कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं।
इसका मतलब यह है कि कुछ सांसदों की शिकायत या राजनीतिक मांग मात्र से संवैधानिक रूप से हटाने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती।
नोटिस में CEC को हटाने के आधार भी बताए जाते हैं और मामला संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी के सामने जाता है।
दूसरा चरण: लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति का फैसला
नोटिस मिलने के बाद अगला महत्वपूर्ण पड़ाव लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति का होता है।
Judges (Inquiry) Act के तहत पीठासीन अधिकारी उपलब्ध सामग्री और आवश्यक परामर्श पर विचार करने के बाद नोटिस को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं।
यही चरण 2026 में ज्ञानेश कुमार के मामले में निर्णायक साबित हुआ। दोनों सदनों में दिए गए नोटिस स्वीकार नहीं किए गए और इसलिए मामला आगे Inquiry Committee के चरण तक नहीं पहुंचा।
तीसरा चरण: तीन सदस्यीय जांच समिति
अगर Removal Motion का नोटिस स्वीकार हो जाए, तो मामला सीधे CEC को हटाने तक नहीं पहुंचता। इसके बाद जांच समिति बनाई जाती है।
Judges (Inquiry) Act के अनुसार समिति में तीन सदस्य होते हैं—
- सुप्रीम कोर्ट के किसी मौजूदा जज या मुख्य न्यायाधीश/जज में से एक सदस्य
- किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश में से एक सदस्य
- एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता यानी Distinguished Jurist
यह समिति आरोपों की जांच करती है।
इसका उद्देश्य यह तय करना होता है कि लगाए गए आरोपों में कानूनी रूप से आगे बढ़ने लायक आधार है या नहीं।
चौथा चरण: आरोप तय होते हैं और CEC को जवाब का मौका
जांच समिति आरोपों को औपचारिक रूप से तय करती है। इसके बाद संबंधित व्यक्ति को आरोपों और उनके आधार की जानकारी दी जाती है।
CEC को अपना बचाव पेश करने का उचित अवसर मिलता है। यानी यह प्रक्रिया केवल आरोप लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि संबंधित अधिकारी को अपना पक्ष रखने का अधिकार भी मिलता है। Judges (Inquiry) Act में इस प्रक्रिया के लिए लिखित बचाव और जांच की व्यवस्था की गई है।
इस चरण में समिति दस्तावेजों, बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार कर सकती है।
पांचवां चरण: जांच समिति की रिपोर्ट
जांच पूरी होने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करती है।
अगर समिति को आरोप साबित नहीं लगते, तो प्रक्रिया आगे बढ़ने की स्थिति नहीं रहती। लेकिन यदि समिति misbehaviour या incapacity से संबंधित आरोपों को साबित मानती है, तो मामला संसद के सामने आगे बढ़ सकता है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—सिर्फ आरोप लग जाना CEC को हटाने का आधार नहीं है। संविधान में “proved misbehaviour or incapacity” यानी सिद्ध कदाचार या अक्षमता का मानक रखा गया है।
छठा चरण: संसद के दोनों सदनों में वोटिंग
अगर जांच समिति की रिपोर्ट हटाने की कार्रवाई के पक्ष में जाती है, तो मामला संसद के दोनों सदनों में पहुंचता है।
यहां साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं होता। संविधान के Article 124(4) के अनुसार प्रस्ताव को प्रत्येक सदन में दो स्तर की विशेष बहुमत की जरूरत होती है—
- सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत
- और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई बहुमत
इसके अलावा दोनों सदनों को इस तरह का Address एक ही संसदीय सत्र में पारित करना होता है।
यानी CEC को हटाने के लिए संसद में राजनीतिक समर्थन के साथ-साथ संविधान में निर्धारित विशेष बहुमत हासिल करना जरूरी है।
सातवां और अंतिम चरण: राष्ट्रपति का आदेश
दोनों सदनों से निर्धारित विशेष बहुमत के साथ प्रस्ताव पारित होने के बाद इसे राष्ट्रपति के सामने प्रस्तुत किया जाता है।
इसके बाद राष्ट्रपति आदेश जारी करके CEC को पद से हटा सकते हैं। यही इस पूरी संवैधानिक प्रक्रिया का अंतिम चरण है।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि संसद में नोटिस आने के साथ ही CEC को हटाया जा सकता है। नोटिस से लेकर जांच, संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत और अंत में राष्ट्रपति के आदेश तक कई संवैधानिक चरण पूरे करने पड़ते हैं।
ज्ञानेश कुमार के मामले में प्रक्रिया कहां रुकी?
2026 में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ Removal Motion को लेकर लोकसभा और राज्यसभा में नोटिस दिए गए थे। लोकसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार 12 मार्च 2026 के नोटिस पर 130 सांसदों के हस्ताक्षर थे।
राज्यसभा में इसी तारीख के नोटिस पर 63 सांसदों के हस्ताक्षर थे।
लेकिन 6 अप्रैल 2026 को लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति ने अपने-अपने स्तर पर नोटिस स्वीकार नहीं किए। इस वजह से मामला तीन सदस्यीय जांच समिति तक नहीं पहुंचा और आगे की संसदीय प्रक्रिया शुरू नहीं हुई।
आखिर इतना कठिन क्यों है CEC को हटाना?
CEC का पद चुनावी व्यवस्था की स्वतंत्रता से जुड़ा संवैधानिक पद है। अगर किसी सरकार के लिए CEC को सामान्य प्रशासनिक आदेश से हटाना संभव होता, तो चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल उठ सकते थे।
इसीलिए संविधान ने CEC के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी Removal Protection रखी है। Election Commission भी अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर स्पष्ट करता है कि CEC को सुप्रीम कोर्ट के जज के समान तरीके और आधार पर हटाया जा सकता है।
यही वजह है कि CEC Removal Process in India एक सामान्य सरकारी सेवा समाप्ति प्रक्रिया नहीं है। इसमें संसद, न्यायिक जांच जैसी प्रक्रिया और राष्ट्रपति—तीनों स्तरों की भूमिका सामने आती है।
ज्ञानेश कुमार को हटाने की प्रक्रिया को समझने के लिए सिर्फ इतना जानना काफी नहीं है कि CEC को सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह हटाया जाता है। इसके पीछे संविधान और कानून की पूरी प्रक्रिया है।
पहले पर्याप्त सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस आता है। फिर लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति उस नोटिस को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं। स्वीकार होने पर तीन सदस्यीय जांच समिति आरोपों की जांच करती है। समिति की रिपोर्ट के बाद मामला संसद में जाता है और दोनों सदनों में विशेष बहुमत की जरूरत होती है। अंत में दोनों सदनों का निर्धारित Address राष्ट्रपति के पास जाता है और राष्ट्रपति के आदेश के बाद ही CEC को पद से हटाया जा सकता है।
2026 में ज्ञानेश कुमार के मामले में प्रक्रिया शुरुआती चरण में ही रुक गई, क्योंकि लोकसभा और राज्यसभा दोनों में दिए गए Removal Notices स्वीकार नहीं किए गए।
इस पूरी व्यवस्था से साफ है कि भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना एक लंबी संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसमें सिर्फ राजनीतिक समर्थन या संसद में नोटिस देना पर्याप्त नहीं होता।