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सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल ने उठाया ‘पैटर्न’ का सवाल, CJI सूर्यकांत की बेंच में बोली अदालत- पहले खुद भी आईना देखना चाहिए

By Aarti Mishra · Published 30 Sep 2026, 17:16 · Updated 30 Sep 2026, 17:16

पश्चिम बंगाल के 10 बागी तृणमूल कांग्रेस (TMC) विधायकों से जुड़े अयोग्यता मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को कई अहम बातें सामने आईं। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने दलील दी कि विधानसभा अध्यक्षों द्वारा अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला लेने में देरी का एक पैटर्न देखने को मिलता है। उन्होंने अदालत से इस पहलू पर भी विचार करने का अनुरोध किया।

मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने की। इस बेंच में CJI सूर्यकांत के अलावा जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे। सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने न्यायपालिका की समय-सीमा को लेकर भी आत्मनिरीक्षण की बात कही और कहा कि दूसरों के लिए समय-सीमा तय करने से पहले अदालत को खुद भी आईना देखना चाहिए।

कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में क्यों उठाया ‘पैटर्न’ का मुद्दा?

सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने सिर्फ मौजूदा मामले में देरी का सवाल नहीं उठाया, बल्कि उन्होंने अयोग्यता याचिकाओं पर फैसले में देरी के कथित पैटर्न की ओर अदालत का ध्यान खींचा।

रिपोर्ट के मुताबिक सिब्बल ने कहा कि उन्हें अदालत के उस आदेश से आपत्ति नहीं है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के फैसले के सिद्धांतों के अनुरूप मामले को देखने की बात कही है। हालांकि उन्होंने आग्रह किया कि अदालत यह भी देखे कि अलग-अलग विधानसभा अध्यक्षों के सामने अयोग्यता की याचिकाएं लंबे समय तक लंबित रहने का क्या प्रभाव पड़ता है।

उनकी दलील का संबंध पश्चिम बंगाल के उन 10 विधायकों से है, जिनके खिलाफ TMC की ओर से अयोग्यता याचिकाएं दाखिल की गई हैं।

क्या है पश्चिम बंगाल के 10 TMC विधायकों का पूरा मामला?

यह विवाद पश्चिम बंगाल विधानसभा के 10 बागी TMC विधायकों से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार इन विधायकों ने एक अलग समूह बनाया है और उनके खिलाफ Tenth Schedule यानी संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता की मांग की गई है।

TMC की ओर से इन विधायकों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाएं 8 जुलाई 2026 को दाखिल की गई थीं। अब इन याचिकाओं पर फैसला लेने में लगने वाला समय सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का मुख्य मुद्दा बन गया है।

दसवीं अनुसूची को आम तौर पर दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के नाम से जाना जाता है। इसके तहत कुछ परिस्थितियों में किसी विधायक या सांसद को दल बदलने के कारण अयोग्य ठहराया जा सकता है।

8 अक्टूबर की तारीख क्यों है बेहद अहम?

इस मामले में 8 अक्टूबर 2026 की तारीख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 8 जुलाई को दाखिल अयोग्यता याचिकाओं से तीन महीने की अवधि इसी दिन पूरी होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के Keisham Meghachandra Singh v. Hon’ble Speaker, Manipur Legislative Assembly मामले में कहा था कि स्पीकर को दसवीं अनुसूची के तहत दायर अयोग्यता याचिकाओं पर उचित समय में फैसला करना चाहिए। सामान्य परिस्थितियों में तीन महीने को बाहरी सीमा माना गया था, हालांकि असाधारण परिस्थितियों में स्थिति अलग हो सकती है।

इसी पुराने फैसले का संदर्भ मौजूदा पश्चिम बंगाल मामले में भी महत्वपूर्ण हो गया है।

‘आईना’ वाली टिप्पणी CJI सूर्यकांत ने नहीं, जस्टिस बागची ने की

इस सुनवाई की सबसे ज्यादा चर्चा जिस टिप्पणी को लेकर हुई, वह थी—“आईना देखने” वाली बात।

यहां एक जरूरी तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। यह टिप्पणी CJI सूर्यकांत ने नहीं, बल्कि जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने की थी।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, जब कपिल सिब्बल ने स्पीकर के कार्यालय से जवाब लेने और अयोग्यता याचिकाओं पर देरी के पैटर्न को देखने की मांग की, तब जस्टिस बागची ने कहा कि दूसरे संवैधानिक प्राधिकारियों को समय-सीमा का निर्देश देने से पहले न्यायपालिका को भी अपने रिकॉर्ड पर नजर डालनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि कई कानूनों में अदालतों के लिए भी समय-सीमा तय होती है, लेकिन कई बार उसका पालन नहीं हो पाता।

इसलिए इस खबर की हेडलाइन में “CJI सूर्यकांत की बेंच” कहना सही है, लेकिन “आईना” वाली टिप्पणी को सीधे CJI सूर्यकांत का बयान बताना सही नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में क्या कहा था?

मौजूदा विवाद को समझने के लिए 2020 का Keisham Meghachandra Singh फैसला बेहद महत्वपूर्ण है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिका पर स्पीकर को उचित समय के भीतर फैसला करना चाहिए। अदालत ने कहा था कि असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर सामान्य तौर पर याचिका दाखिल होने की तारीख से तीन महीने को बाहरी सीमा माना जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना था कि दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता का फैसला करते समय स्पीकर एक तरह की ट्रिब्यूनल जैसी भूमिका निभाते हैं और उनका निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन हो सकता है।

उस मामले में स्पीकर के सामने अयोग्यता याचिकाएं लंबे समय से लंबित थीं। सुप्रीम कोर्ट ने अंततः मणिपुर विधानसभा के स्पीकर को लंबित याचिकाओं पर चार सप्ताह के भीतर फैसला लेने का निर्देश दिया था।

दल-बदल कानून में स्पीकर की भूमिका क्या है?

संविधान की दसवीं अनुसूची का उद्देश्य दल-बदल से जुड़े मामलों में निर्वाचित प्रतिनिधियों की अयोग्यता का प्रावधान करना है।

ऐसे मामलों में विधानसभा का स्पीकर या लोकसभा का स्पीकर महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिका निभाता है। हालांकि स्पीकर आम तौर पर किसी राजनीतिक दल से जुड़े होते हैं, लेकिन अयोग्यता याचिका पर निर्णय लेते समय उनसे संवैधानिक और न्यायिक दायित्व के अनुरूप निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाने की अपेक्षा की जाती है।

यही वजह है कि समय-सीमा और स्पीकर की भूमिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सामने समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।

2020 के Keisham Meghachandra Singh फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने संसद से इस व्यवस्था पर पुनर्विचार करने की बात भी कही थी कि क्या अयोग्यता से जुड़े विवादों का फैसला स्पीकर के बजाय किसी स्वतंत्र व्यवस्था या ट्रिब्यूनल को सौंपा जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा मामले में क्या कहा?

मौजूदा सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल विधानसभा के स्पीकर के लिए कोई अलग नई समय-सीमा तय नहीं की। इसके बजाय CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने भरोसा जताया कि स्पीकर पहले से स्थापित न्यायिक सिद्धांतों से परिचित हैं और उसी के अनुसार उचित निर्णय लेने का प्रयास करेंगे।

अदालत का रुख यह रहा कि Keisham Meghachandra Singh में स्थापित सिद्धांत पहले से मौजूद हैं और स्पीकर को उनके अनुरूप कार्रवाई करनी चाहिए।

यानी इस सुनवाई में अदालत ने सीधे यह नहीं कहा कि वह खुद विधायकों की अयोग्यता का फैसला करेगी। मामला संवैधानिक प्रक्रिया के तहत संबंधित प्राधिकारी के सामने ही रहने दिया गया।

कपिल सिब्बल की दलील में ‘देरी’ क्यों बनी बड़ा मुद्दा?

कपिल सिब्बल ने जिस “पैटर्न” की बात की, उसका केंद्र अयोग्यता मामलों में होने वाली देरी है।

दल-बदल विरोधी कानून का प्रभाव तभी दिखाई देता है जब अयोग्यता से जुड़े मामलों पर समय पर फैसला हो। अगर फैसला लंबे समय तक लंबित रहता है, तो संबंधित विधायक उस दौरान सदन के सदस्य बने रह सकते हैं और राजनीतिक परिस्थितियां भी बदल सकती हैं।

यही व्यापक संवैधानिक सवाल इस मामले को महत्वपूर्ण बनाता है।

हालांकि किसी विशेष मामले में देरी का कारण क्या है, यह तय करने के लिए संबंधित रिकॉर्ड और प्रक्रिया को देखना जरूरी होता है। इसलिए केवल देरी को आधार बनाकर किसी संस्था या व्यक्ति की मंशा के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

‘आईना’ टिप्पणी का व्यापक मतलब क्या है?

जस्टिस बागची की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण पहलू न्यायपालिका के आत्मनिरीक्षण से जुड़ा है।

अदालतें कई मामलों में प्रशासनिक और संवैधानिक संस्थाओं से कानून और संविधान के अनुरूप समय पर काम करने की अपेक्षा करती हैं। लेकिन जस्टिस बागची की टिप्पणी ने यह सवाल सामने रखा कि क्या न्यायपालिका खुद उन सभी वैधानिक समय-सीमाओं का लगातार पालन कर पाती है, जो अलग-अलग कानूनों में निर्धारित हैं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने स्पीकर की देरी को सही ठहराया। बल्कि सुनवाई के दौरान न्यायपालिका के अपने कामकाज की समयबद्धता को भी चर्चा का हिस्सा बनाया गया।

अब आगे क्या होगा?

8 जुलाई 2026 को दाखिल हुई अयोग्यता याचिकाओं की तीन महीने की अवधि 8 अक्टूबर 2026 को पूरी होनी है। इसलिए अब इस मामले में अगला महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह होगा कि पश्चिम बंगाल विधानसभा के स्पीकर इन याचिकाओं पर क्या निर्णय लेते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उसे उम्मीद है कि स्पीकर Keisham Meghachandra Singh में निर्धारित सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए उचित निर्णय लेने का प्रयास करेंगे।

इस मामले का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह केवल 10 विधायकों की अयोग्यता का विवाद नहीं है। इसके साथ यह बड़ा संवैधानिक प्रश्न भी जुड़ा है कि दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता की प्रक्रिया कितनी समयबद्ध होनी चाहिए और स्पीकर की भूमिका की न्यायिक समीक्षा किस तरह की जा सकती है।

‘पैटर्न’ से लेकर ‘आईना’ तक, सुनवाई में उठे कई संवैधानिक सवाल

पश्चिम बंगाल के 10 TMC विधायकों की अयोग्यता से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ने दल-बदल कानून, स्पीकर की भूमिका और न्यायपालिका की समयबद्धता तीनों मुद्दों को एक साथ चर्चा में ला दिया है।

कपिल सिब्बल ने अयोग्यता मामलों में देरी के कथित “पैटर्न” का मुद्दा उठाया, जबकि जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने अदालतों की अपनी समय-सीमा और लंबित मामलों पर आत्मनिरीक्षण की बात कही। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने मौजूदा मामले में पहले से स्थापित Keisham Meghachandra Singh सिद्धांतों के अनुरूप कार्रवाई की उम्मीद जताई है।

अब सबसे महत्वपूर्ण तारीख 8 अक्टूबर 2026 है। इसी दिन 8 जुलाई को दायर अयोग्यता याचिकाओं की तीन महीने की अवधि पूरी होगी। आगे स्पीकर का निर्णय और उसके बाद होने वाली कानूनी कार्रवाई यह तय करेगी कि यह मामला किस दिशा में आगे बढ़ता है।