Violence in Bangladesh: इंसानियत लहूलुहान,क्या नफरत के बाजार में भीड़ ही फैसला करेगी?
इंसानियत लहूलुहान है, नफ़रत का बाज़ार गर्म है,कहीं भीड़ का शोर है, तो कहीं कानून भी दम तोर है। पेड़ से लटकती लाश पूछती है— ये कैसी आज़ादी है? जहाँ इल्ज़ाम ही फैसला है और ख़ामोशी ही बर्बादी है इसी सब मुदो पर चर्चा करुं उससे पहले मेरा छोटा सा परिचय स्वीकार कीजिए “नमस्कार मेरा…

इंसानियत लहूलुहान है, नफ़रत का बाज़ार गर्म है,कहीं भीड़ का शोर है, तो कहीं कानून भी दम तोर है। पेड़ से लटकती लाश पूछती है— ये कैसी आज़ादी है? जहाँ इल्ज़ाम ही फैसला है और ख़ामोशी ही बर्बादी है
- (1)क्या बांग्लादेश एक वार फिर से 2024 जैसी क्रांति की दहलीज पर है?
- (2)क्या एक छात्र नेता की हत्या, जलते हुए मीडिया ऑफिस और सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब— की वजह से ये सब हो रहा है
- (3)क्या बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू सुरक्षित नहीं है?
- (4)क्या बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यक हिंदू अपने आप को खतरे में महसूस कर रहे है?
- (5)क्या 25-30 साल के गारमेंट्स फैक्ट्री में मजदूरी करके अपना पेट पालने वाले मजदूर हि “लिंचिंग का शिकार हुए”
- (6)क्या हिंदू युवक दीपू चंद्र दास ने बिते
18 दिसंबर की रात को कथित ईशनिंदा (पैगंबर के बारे में अपमानजनक टिप्पणी) भी किया था!! और किया तो क्या किया - (7)की उसके बदले में बांग्लादेश की सड़कों पर उतरी उग्र भीड़ को पीट-पीटकर हत्या करनी परी और फिर शव को पेड़ से लटका कर आग के हवाले करना पड़ा!
- (8)क्या हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की भीड़ द्वारा बर्बरतापूर्ण तरीके से की गई हत्या एक हत्या नहीं बल्कि बहुत बड़े राजनीतिक के साजिश की ओर इशारा कर रहा है?
- (8) क्या बांग्लादेश में बिते 48 घंटों के भीतर जो घटना घटा है, क्या यह एक पहेली यैसी घटना है जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। या इससे पहले भी कभी हिंदुओं के साथ इससे बड़ा नरसंहार हुआ था
- (9)क्या यूनुस सरकार बांग्लादेश में इस उबलते गुस्से को शांत कर पाएगी या यह देश एक नए गृहयुद्ध की ओर बढ़ता जा रहा है?
इसी सब मुदो पर चर्चा करुं उससे पहले मेरा छोटा सा परिचय स्वीकार कीजिए “नमस्कार मेरा नाम कुमार शिवम है और आप लोग “खबर बाईट (Khabar Bite)” पर के “सफेद पंचायत (Safed Panchayt)” पंचायत के माध्यम से इस कार्यक्रम को देख रहे हैं। जहां आपको दिखाया जाता है ईमानदारी पूर्वक बनाई गई पारदर्शी खबरें जिसमें होता है निष्पक्ष 100% पंचायत
- क्या बांग्लादेश एक वार फिर से 2024 जैसी क्रांति की दहलीज पर है?
उत्तर:- नहीं, बांग्लादेश फिलहाल 2024 की छात्र-नेतृत्व वाली क्रांति (जिसने शेख हसीना की सरकार गिराई) जैसी किसी नई पूर्ण क्रांति की दहलीज पर नहीं है। हालांकि, देश में गंभीर राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा और तनाव जरूर है, जो चुनावों से पहले बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
2.क्या एक छात्र नेता की हत्या, जलते हुए मीडिया ऑफिस और सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब— की वजह से ये सब हो रहा है?
उत्तर:- हाँ, मुख्य रूप से हाँ — वर्तमान हिंसा, जलते हुए मीडिया ऑफिस और सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब शरीफ ओसमान हादी (Sharif Osman Hadi) की मौत की वजह से ही हो रहा है। (I) लेकिन जानिए कौन हैं हादी और हादी का पुरा नाम शरीफ ओसमान हादी है, जिसके उम्र तकरीबन 32 था ईसने छात्र नेता और 2024 वाले हिंसा में ईसे क्रांति कारी के के प्रमुख चेहरे शरीफ ओसमान हादी को माना जा रहा था जिसे बिते 12 दिसंबर को ढाका में मस्जिद से निकलते समय मास्कधारी हमलावरों ने गोली मारी। आनन फानन में सिंगापुर में इलाज के भारती कराया गया जहां ईलाज के दौरान बिते 18 दिसंबर को उनकी मौत हो गई।
3. क्या बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू सुरक्षित नहीं है? उत्तर:- हां, बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से हिंदू समुदाय पर हमले बढ़े हैं, और 2025 में भी यह पैटर्न जारी है। हालांकि, अंतरिम सरकार (मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली सरकार नें) इनकी निंदा करती रही है और कुछ मामलों में कार्रवाई भी कि है, लेकिन अल्पसंख्यक संगठनों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू अपने आप को हमेशा की तरह अभी भी असुरक्षित महसूस करते हैं। हमेसा से हिंदू समुदाय में डर का माहौल बना रहता है।
(i) बांग्लादेश में हुए हिंदुओं पर हमलों की संख्या की बात करें तो: अगस्त 2024 से जून 2025 तक: लग-भग 2,442 घटनाएं हुई, जिनमें 27 से अधिक हत्याएं भी शामिल।वहीं 2025 की पहली छमाही में यह आंकड़ा: 258 सांप्रदायिक हमले हुए, जिनमें 20 से अधिक बलात्कार जैसी दुष्कर्म सामिल है, वहीं 59 पूजा स्थलों पर हमले हुए।
4. क्या बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यक हिंदू अपने आप को खतरे में महसूस कर रहे है? उत्तर:-हाँ, बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के बड़े हिस्से में खतरे और असुरक्षा की भावना प्रबल है। 2024 में शेख हसीना सरकार गिरने के बाद से हमलों में वृद्धि हुई है, और 2025 में भी यह जारी है, जिससे डर का माहौल बना हुआ है।
5.क्या 25-30 साल के गारमेंट्स फैक्ट्री में मजदूरी करके अपना पेट पालने वाले मजदूर हि “लिंचिंग का शिकार हुए”उत्तर:- हां, हाल ही में बांग्लादेश में एक यैसी घटना घटी है जहां 30 साल के एक गारमेंट फैक्ट्री वर्कर, दिपू चंद्र दास (Dipu Chandra Das), को ब्लास्फेमी (ईशनिंदा) के आरोप में आक्रोशित भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर डाला और फिर शव को ऊंची पेड़ पर लटका कर बर्बरता पूर्ण तरीके से आग के हवाले कर दिया। जिस घटना की वीडियो सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल हो रहा है, (i)यह घटना बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमलों के संदर्भ में देखी जा रही है, जहां सोशल मीडिया पर एक पोस्ट को लेकर अफवाह फैली और भीड़ ने हमला कर दिया। हालांकि, भारत में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां मजदूर या प्रवासी कामगार लिंचिंग के शिकार हुए हैं,
6.क्या हिंदू युवक दीपू चंद्र दास ने बिते 18 दिसंबर की रात को कथित ईशनिंदा (पैगंबर के बारे में अपमानजनक टिप्पणी) भी किया था!! और किया तो क्या किया? उत्तर:-नहीं, उपलब्ध सभी विश्वसनीय रिपोर्ट्स और समाचार स्रोतों के अनुसार, दीपू चंद्र दास पर ईशनिंदा का सिर्फ आरोप लगा था, लेकिन यह कोई सोशल मीडिया पोस्ट या लिखित टिप्पणी नहीं थी। बल्कि, यह एक मौखिक आरोप था जो फैक्ट्री में एक छोटी-मोटी बहस या घटना के दौरान उत्पन्न हुआ था।
(i) की उसके बदले में बांग्लादेश की सड़कों पर उतरी उग्र भीड़ को पीट-पीटकर हत्या करनी परी और फिर शव को पेड़ से लटका कर आग के हवाले करना पड़ा? उत्तर:- नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं था कि दीपू चंद्र दास के “बदले में” भीड़ को यह सब करना “पड़ा”। यह एक एकतरफा, क्रूर भीड़ हिंसा की घटना थी, जो एक कथित मौखिक आरोप पर आधारित थी।
8.क्या बांग्लादेश में बिते 48 घंटों के भीतर जो घटना घटा है, क्या यह एक पहेली यैसी घटना है जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। या इससे पहले भी कभी हिंदुओं के साथ इससे बड़ा नरसंहार हुआ था? उत्तर:-नहीं, बांग्लादेश में 18 दिसंबर 2025 को हुई दीपू चंद्र दास की लिंचिंग कोई पहली या अनोखी घटना नहीं है, और न ही इसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है – हालांकि इसने भारत और बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर बहस छेड़ी है, खासकर सोशल मीडिया पर। यह एक क्रूर भीड़ हिंसा का मामला है, जहां एक हिंदू गारमेंट वर्कर को ब्लास्फेमी के कथित आरोप पर पीट-पीटकर मार डाला गया और शव को जला दिया गया, लेकिन बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने इसे “घृणित अपराध” बताते हुए 7 लोगों को गिरफ्तार किया है।
बांग्लादेश आज एक ऐसे दहलीज पर खड़ी है जहाँ एक ओर ‘देश की नई आज़ादी’ का जश्न मनाना चाहता है, तो वहीं दूसरी ओर दीपू चंद्र दास जैसे अल्पसंख्यक मासूम हिंदुओं की चिखती जलती हुई लाशें उसे मिली लोकतांत्रिक अधिकारों पर सवालिया निशान खड़ा कर रहा हैं। एक छात्र नेता की हत्या से उपजा बहुत संख्यक मुसलमानों का जनाआक्रोश और एक मामूली मज़दूर की मॉब लिंचिंग—ये दोनों घटनाएँ बताती हैं कि देश के कानून व्यवस्था की कैसी शासन है (Rule of Law) जिसे चंद आए भीड़तंत्र ने अपने ही हाथों बंधक बनता जा रहा है।
इसी सब मुद्दों पर खबर बाईट पर चल रहे स्पेशल एपिसोड सफेद पंचायत के माध्यम से आज हम जनता के एक बड़े मुद्दा पर चर्चा किए की क्या मजहब और सियासत के नाम पर बांग्लादेश में बहाया गया खून किसी क्रांति का जन्म दे सकता है? क्या मोहम्मद यूनुस की बनी अंतरिम सरकार के लिए यह केवल कानून-व्यवस्था को चुनौती का मामला नहीं, बल्कि बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यकों हिन्दूओं के मन में विश्वास बहाली करने की एक सबसे बड़ी परीक्षा है। जहां हो रही घटनाएं की आँकड़े गवाह हैं कि हिंदू समुदाय आज एक गहरे असुरक्षा की बोझ में घिरा हुआ है। यदि आज बांग्लादेश की सड़कों पर उतरी शोर मचाती भीड़ ही फैसला सुनती रही और न्याय के नाम पर आने वाले दिनों में भी बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यक हिंदुओं की लाशें यैसे ही बीच चौराहे के पेड़ों पर लटकती रही तो उसे आज़ादी नहीं मानकर बल्कि अराजकता की ओर बढ़ता हुआ एक खतरनाक कदम मानना गलत होगा क्या
जहां अल्पसंख्यक हिंदुओं के इंसानियत को लहूलुहान होने से बचाने के लिए अब केवल निंदा ही काफी नहीं है, बल्कि दोषियों को जल्द से जल्द सलाखों के पीछे पहुंचाकर कठोर से कठोर कानूनी कार्रवाई करते हुए समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को आत्मविश्वास और सुरक्षा गारंटी सुनिश्चित करना चाहिए। वरना इतिहास गवाह है कि जब-जब ख़ामोशी ने बर्बादी का साथ दिया है, तब-तब सभ्यताओं ने अपना अस्तित्व खोया है।
कुमार शिवम, ‘खबर बाइट’ (सफेद पंचायत)
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