यूपी की वोटर लिस्ट पर सियासी संग्राम: योगी के 1.27 करोड़ वाले दावे पर अखिलेश का पलटवार, बोले- रामलीला मैदान आइए

उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची को लेकर सियासत एक बार फिर गरमा गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया है कि प्रदेश में करीब 1.27 करोड़ हिंदू मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट में नहीं हैं। उनके इस बयान ने राजनीतिक बहस को नया मोड़ दे दिया है। अब तक मतदाता सूची में गड़बड़ी और वोट कटने का मुद्दा विपक्ष उठा रहा था, लेकिन मुख्यमंत्री के इस दावे के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी सवालों की झड़ी लगा दी है।
अखिलेश यादव ने तंज कसते हुए कहा कि जब मुख्यमंत्री खुद कह रहे हैं कि इतने बड़े पैमाने पर वोट कम हुए हैं, तो उन्हें भी दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली रैली में पहुंचना चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि आखिर मुख्यमंत्री को 1.27 करोड़ वोटरों के नाम गायब होने का आंकड़ा कहां से मिला और इसकी जानकारी किसने दी? इस बयान के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में वोटर लिस्ट, SIR और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर बहस तेज हो गई है।
योगी आदित्यनाथ ने आखिर क्या दावा किया?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 30 अक्टूबर को लखनऊ में आयोजित भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में मतदाता सूची का मुद्दा उठाया था। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को आगाह करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में करीब 1.27 करोड़ हिंदू मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट में नहीं हैं। मुख्यमंत्री के मुताबिक, यह स्थिति राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
योगी ने दावा किया कि प्रदेश की जनसंख्या के हिसाब से यहां 16 करोड़ से अधिक मतदाता होने चाहिए, जबकि मौजूदा मतदाता सूची में करीब 13 करोड़ मतदाता दर्ज हैं। उन्होंने यह भी कहा कि करीब 66 लाख ऐसे लोग हैं जिनके नाम पंचायत की मतदाता सूची में तो हैं, लेकिन विधानसभा की मतदाता सूची में नहीं मिल रहे हैं।
मुख्यमंत्री ने सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों और युवाओं का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, करीब 55 लाख सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के नाम मतदाता सूची में नहीं हैं। इसके अलावा 18 से 19 साल के लगभग 4.5 लाख युवाओं के नाम भी सूची में शामिल नहीं होने की बात कही गई। योगी ने भाजपा संगठन को निर्देश दिया कि कार्यकर्ता बूथ स्तर पर सक्रिय होकर पात्र लोगों के नाम मतदाता सूची में जुड़वाने में मदद करें।
अखिलेश यादव ने पूछा- मुख्यमंत्री को यह आंकड़ा किसने दिया?
योगी आदित्यनाथ के बयान पर अखिलेश यादव ने 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्ष की रैली से पहले प्रतिक्रिया दी। उन्होंने मुख्यमंत्री के दावे पर सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर उन्हें 1.27 करोड़ वोटरों के नाम गायब होने की जानकारी कहां से मिली? यह आंकड़ा किसने उपलब्ध कराया और इसके पीछे क्या आधार है?
अखिलेश ने कहा कि मुख्यमंत्री पहले भी करोड़ों वोट कटने की बात कह चुके हैं। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि उन्हें ये आंकड़े कहां से मिल रहे हैं। उनके मुताबिक, मतदाता सूची से जुड़ा इतना बड़ा आंकड़ा कोई सामान्य जानकारी नहीं है, इसलिए इसका स्रोत और आधार सार्वजनिक होना चाहिए।
सपा प्रमुख ने इस मुद्दे को एमएलसी चुनाव में भाजपा को मिली हार से भी जोड़ दिया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि मुख्यमंत्री को 1.27 करोड़ वोट कम होने की बात एमएलसी चुनाव में हार के बाद याद आई। भाजपा के ‘डबल इंजन’ वाले नारे पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने ‘डबल जीरो’ और एक ही चुनाव में दोहरी हार जैसी टिप्पणी भी की।
‘उन्हें भी रामलीला मैदान आ जाना चाहिए’
अखिलेश यादव का सबसे चर्चित बयान रामलीला मैदान की रैली को लेकर रहा। उन्होंने कहा कि अगर मुख्यमंत्री खुद कह रहे हैं कि इतने बड़े पैमाने पर लोगों के नाम मतदाता सूची में नहीं हैं, तो उन लोगों को भी रामलीला मैदान आना चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया कि एक तरफ सरकार के स्तर से लाखों लाभार्थियों के वोटर लिस्ट में नाम नहीं होने की बात कही जा रही है और दूसरी तरफ विपक्ष पर सवाल उठाए जा रहे हैं। अखिलेश के मुताबिक, अगर इतने लोगों के नाम सूची से बाहर हैं तो यह अन्याय का मुद्दा है और प्रभावित लोगों को भी अपनी बात रखने का मौका मिलना चाहिए।
अखिलेश का यह बयान ऐसे समय आया है, जब दिल्ली में विपक्षी गठबंधन INDIA की ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली आयोजित की गई। इस रैली में विपक्षी दलों ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं, SIR प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर सवाल उठाए।
क्या है SIR और क्यों हो रहा है विवाद?
SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और उसमें मौजूद गलतियों को दूर करना है। इस प्रक्रिया के तहत मृत मतदाताओं, स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके लोगों, दोहरी प्रविष्टियों और अन्य अपात्र नामों की जांच की जाती है। साथ ही पात्र नए मतदाताओं के नाम जोड़ने का काम भी होता है।
उत्तर प्रदेश में इस प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची में बड़े बदलाव हुए। अप्रैल 2026 में प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची के आंकड़ों के मुताबिक, SIR से पहले प्रदेश में करीब 15.44 करोड़ मतदाता दर्ज थे। अंतिम सूची में यह संख्या घटकर लगभग 13.39 करोड़ रह गई। इस प्रक्रिया में करीब 2.04 करोड़ नाम हटाए गए, जबकि लगभग 84.28 लाख नए नाम जोड़े गए।
हालांकि, इन आंकड़ों को समझना जरूरी है। चुनाव आयोग के सामने उपलब्ध कुल मतदाता सूची के आंकड़े सभी मतदाताओं से संबंधित हैं। इन्हें केवल हिंदू मतदाताओं के नाम कटने का आधिकारिक प्रमाण नहीं माना जा सकता। योगी आदित्यनाथ का 1.27 करोड़ हिंदू मतदाताओं वाला आंकड़ा उनका राजनीतिक दावा है। धर्म के आधार पर इतने नाम हटने की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि सामने आना जरूरी है। यही वजह है कि अखिलेश यादव इस आंकड़े का स्रोत पूछ रहे हैं।
रामलीला मैदान में विपक्ष ने क्यों जुटाई ताकत?
दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर को INDIA गठबंधन ने ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ के नाम से रैली आयोजित की। विपक्षी दलों का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान कई जगह पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जाने की आशंका है। विपक्ष ने SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी उठाई।
रैली का मकसद केवल उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची का मुद्दा उठाना नहीं था, बल्कि देशभर में चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और चुनाव आयोग की जवाबदेही पर बहस को आगे बढ़ाना भी था। कांग्रेस नेता राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, अखिलेश यादव और अन्य विपक्षी नेताओं की मौजूदगी ने इस कार्यक्रम को राजनीतिक रूप से अहम बना दिया।
विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची में किसी भी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से नहीं कटना चाहिए। वहीं भाजपा और चुनाव आयोग की ओर से SIR को मतदाता सूची साफ और दुरुस्त करने की प्रक्रिया बताया जाता रहा है। ऐसे में दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है।
वोटर लिस्ट में नाम नहीं है तो क्या करें?
इस राजनीतिक विवाद के बीच आम मतदाता के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि वह अपनी वोटर लिस्ट में नाम जरूर जांचे। अगर किसी पात्र नागरिक का नाम सूची में नहीं है, तो वह चुनाव आयोग के आधिकारिक मतदाता सेवा पोर्टल पर जानकारी देख सकता है।
नया नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 का इस्तेमाल किया जाता है। नाम, पता या अन्य विवरण में सुधार के लिए संबंधित फॉर्म के जरिए आवेदन किया जा सकता है। अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि उसका नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो वह संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) के सामने अपनी शिकायत और दस्तावेज प्रस्तुत कर सकता है। अंतिम मतदाता सूची से जुड़े फैसले के खिलाफ नियमानुसार अपील का विकल्प भी उपलब्ध होता है।
अब आगे क्या होगा?
उत्तर प्रदेश में 1.27 करोड़ हिंदू मतदाताओं के नाम गायब होने का दावा अब केवल चुनावी आंकड़ों तक सीमित नहीं रह गया है। इसने भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच राजनीतिक टकराव को और तेज कर दिया है। योगी आदित्यनाथ ने अपने कार्यकर्ताओं को पात्र मतदाताओं के नाम जुड़वाने के लिए अभियान चलाने को कहा है, जबकि अखिलेश यादव इस दावे के स्रोत और समय पर सवाल उठा रहे हैं।
इस पूरे मामले में सबसे अहम बात यह होगी कि मतदाता सूची से जुड़े आंकड़ों का आधिकारिक आधार क्या है और जिन लोगों के नाम सूची में नहीं हैं, उन्हें जोड़ने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं। लोकतंत्र में मतदाता का नाम सूची में होना उसके मतदान के अधिकार की बुनियादी शर्त है। इसलिए राजनीतिक आरोपों से अलग, जरूरी है कि हर पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में शामिल हो और किसी का वोट अधिकार प्रशासनिक गलती या लापरवाही के कारण न छूटे।
फिलहाल योगी के 1.27 करोड़ वाले दावे और अखिलेश के रामलीला मैदान वाले तंज ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा भाजपा और विपक्ष के बीच राजनीतिक बयानबाजी का बड़ा केंद्र बना रह सकता है।