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राजनीति

फारूक अब्दुल्ला का बड़ा बयान: ‘दिल्ली से इंसाफ की उम्मीद नहीं’, पाकिस्तान को लेकर कही ये बात

By Aarti Mishra · Published 24 Oct 2026, 18:09 · Updated 24 Oct 2026, 18:10

फारूक अब्दुल्ला का बयान, अनुच्छेद 370 और जम्मू-कश्मीर के अधिकारों पर राजनीतिक चर्चा

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक बार फिर अनुच्छेद 370, केंद्र सरकार और कश्मीरियों के अधिकारों को लेकर बहस तेज हो गई है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने बारामुला में एक कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि दिल्ली से न्याय की उम्मीद करना मुश्किल है और लोगों को अपने अधिकारों के लिए खुद आवाज उठानी होगी। पाकिस्तान को लेकर उनकी टिप्पणी भी चर्चा में आ गई है।

फारूक अब्दुल्ला ने दावा किया कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीरियों का मुद्दा उठाता है। उनके इस बयान को लेकर राजनीतिक बहस छिड़ने की संभावना है। हालांकि, उनके भाषण में केवल पाकिस्तान का मुद्दा ही नहीं था, बल्कि जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता, प्रशासनिक व्यवस्था और मेडिकल संस्थानों से जुड़े सवाल भी शामिल थे।

बारामुला में कार्यकर्ता सम्मेलन के दौरान केंद्र पर निशाना

24 अक्टूबर 2026 को बारामुला में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन में फारूक अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर के लोगों से अपने अधिकारों के लिए मजबूती से आवाज उठाने की अपील की। उन्होंने कहा कि यदि लोग अपने अधिकारों और पहचान के लिए खड़े नहीं होंगे, तो उनकी समस्याएं और बढ़ सकती हैं।

उनके बयान का मुख्य जोर इस बात पर था कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को अपने भविष्य, अधिकारों और राजनीतिक पहचान से जुड़े मुद्दों पर चुप नहीं रहना चाहिए। उन्होंने केंद्र की नीतियों और मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि लोगों को अपने हक के लिए संघर्ष करने का साहस रखना होगा।

फारूक अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि देश के साथ आगे बढ़ने और देश के लिए योगदान देने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन सत्ता में बैठे लोगों को भी अपनी कार्यशैली में सुधार करना चाहिए।

पाकिस्तान को लेकर क्या बोले फारूक अब्दुल्ला?

इस पूरे बयान में सबसे ज्यादा चर्चा पाकिस्तान को लेकर की गई टिप्पणी की हो रही है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि पाकिस्तान विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीरियों का मुद्दा उठाता है। उन्होंने इसी संदर्भ में दावा किया कि इससे जम्मू-कश्मीर के लोगों को मदद मिल रही है।

उनकी इस टिप्पणी को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो सकता है, क्योंकि भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर का मुद्दा लंबे समय से संवेदनशील रहा है। भारत का आधिकारिक रुख है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और इस विषय पर किसी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार्य नहीं है।

फारूक अब्दुल्ला की टिप्पणी को इसी व्यापक राजनीतिक और कूटनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, उनके बयान को लेकर किसी भी राजनीतिक प्रतिक्रिया या विवाद के बारे में निष्कर्ष निकालने से पहले संबंधित पक्षों की आधिकारिक प्रतिक्रिया देखना जरूरी होगा।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि पाकिस्तान द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाना और उससे जम्मू-कश्मीर के लोगों को वास्तव में क्या लाभ मिला है, ये दो अलग-अलग बातें हैं। फारूक अब्दुल्ला ने इस बारे में अपना राजनीतिक मत रखा है, लेकिन उनके दावे को अपने आप में प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता।

अनुच्छेद 370 का मुद्दा अब भी राजनीति के केंद्र में

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है। अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को समाप्त कर दिया था। इसके साथ ही तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख नाम के दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया।

इस फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर की राजनीति में कई बड़े बदलाव आए। नेशनल कॉन्फ्रेंस सहित कई राजनीतिक दलों ने विशेष दर्जे को समाप्त किए जाने का विरोध किया और राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग उठाई।

फारूक अब्दुल्ला पहले भी अनुच्छेद 370 और राज्य के दर्जे के सवाल पर केंद्र सरकार की आलोचना करते रहे हैं। उनका तर्क रहा है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों की राजनीतिक आकांक्षाओं और अधिकारों को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए।

हाल के दिनों में भी उन्होंने अनुच्छेद 370 पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले, राज्य का दर्जा बहाल करने में हो रही देरी और केंद्र-प्रदेश संबंधों को लेकर सवाल उठाए हैं।

इसलिए बारामुला में दिया गया उनका ताजा बयान भी जम्मू-कश्मीर के अधिकारों और राजनीतिक भविष्य से जुड़ी उनकी पुरानी मांगों के संदर्भ में देखा जा रहा है।

मेडिकल छात्रों और अस्पतालों की व्यवस्था पर भी उठाए सवाल

फारूक अब्दुल्ला ने अपने भाषण में जम्मू-कश्मीर के स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े मुद्दों को भी उठाया। उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए अनिवार्य सेवा से संबंधित व्यवस्था का जिक्र किया।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने कहा कि मेडिकल छात्रों को दो साल तक अस्पतालों में सेवा देनी होती है। ऐसा नहीं करने पर उन्हें 40 लाख रुपये तक की राशि चुकाने का प्रावधान है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस व्यवस्था से संबंधित फाइल लंबे समय से उपराज्यपाल के पास लंबित है और इस पर फैसला नहीं लिया गया है।

फारूक अब्दुल्ला ने इस मुद्दे को प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी से जोड़ते हुए सवाल उठाए। उनका कहना था कि जब महत्वपूर्ण फैसले लंबे समय तक लंबित रहते हैं, तो इसका असर संबंधित लोगों और संस्थानों पर पड़ता है।

हालांकि, इस मामले में फाइल की मौजूदा स्थिति और निर्णय में देरी के कारणों को लेकर संबंधित प्रशासन की ओर से विस्तृत प्रतिक्रिया सामने आना जरूरी है। फिलहाल इस विषय पर फारूक अब्दुल्ला के आरोपों को उनके बयान के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।

मेडिकल संस्थानों की स्वायत्तता का मुद्दा भी उठाया

नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष ने मेडिकल संस्थानों की कार्यप्रणाली और उनकी स्वायत्तता को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले संस्थानों के निदेशक और संबंधित समितियां उपकरणों की खरीद तथा डॉक्टरों की नियुक्ति जैसे मामलों में निर्णय लेने की अधिक स्वतंत्रता रखती थीं।

उनके मुताबिक, मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में संस्थानों की निर्णय लेने की शक्तियां कम हुई हैं। उन्होंने इस बदलाव पर असंतोष जताते हुए कहा कि संस्थानों को अपने कामकाज से जुड़े जरूरी फैसले लेने की पर्याप्त स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

यह मुद्दा केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं है। स्वास्थ्य संस्थानों में नियुक्तियों, उपकरणों की खरीद और प्रशासनिक निर्णयों का सीधा संबंध स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता से भी होता है। हालांकि, स्वायत्तता को लेकर लगाए गए आरोपों की पूरी तस्वीर समझने के लिए मौजूदा नियमों और प्रशासन का पक्ष भी जानना जरूरी होगा।

लोगों से की अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की अपील

अपने संबोधन में फारूक अब्दुल्ला ने लोगों से अपील की कि वे अपने अधिकारों और पहचान से जुड़े मुद्दों पर मजबूती से खड़े हों। उन्होंने कहा कि यदि लोग अपनी बात सामने नहीं रखेंगे, तो उनकी समस्याओं का समाधान मुश्किल हो सकता है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि देश के साथ आगे बढ़ना और देश के लिए योगदान देना उनके लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन सरकार और प्रशासन को भी जनता की समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए।

उनके बयान से यह संकेत मिलता है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस जम्मू-कश्मीर के अधिकारों, प्रशासनिक स्वायत्तता और राज्य का दर्जा बहाल करने जैसे मुद्दों को राजनीतिक चर्चा में प्रमुखता से उठाना चाहती है।

फारूक अब्दुल्ला के बयान के राजनीतिक मायने क्या हैं?

फारूक अब्दुल्ला का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है, जब जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370, राज्य का दर्जा और केंद्र तथा स्थानीय सरकार के अधिकारों को लेकर बहस जारी है।

उनकी पाकिस्तान संबंधी टिप्पणी राजनीतिक रूप से संवेदनशील है और इस पर अलग-अलग दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं। दूसरी ओर, मेडिकल छात्रों की अनिवार्य सेवा और संस्थानों की स्वायत्तता जैसे मुद्दे प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े हैं, जिनका समाधान नीतिगत फैसलों पर निर्भर करता है।

ऐसे में उनके बयान को दो स्तरों पर समझा जा सकता है। पहला, जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक अधिकारों और पहचान से जुड़ा सवाल। दूसरा, स्थानीय प्रशासन में निर्णय लेने की शक्तियों और सरकारी कामकाज से जुड़ी समस्याएं।

हालांकि, किसी भी राजनीतिक बयान का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि उससे जुड़े मुद्दों पर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं और सरकार की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है।

बारामुला में फारूक अब्दुल्ला के बयान ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में अनुच्छेद 370, केंद्र सरकार की नीतियों और पाकिस्तान की भूमिका को लेकर चर्चा को फिर तेज कर दिया है। उन्होंने दिल्ली से न्याय मिलने पर सवाल उठाते हुए लोगों से अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की अपील की।

पाकिस्तान को लेकर उनकी टिप्पणी सबसे अधिक चर्चा में है, जबकि मेडिकल छात्रों की अनिवार्य सेवा और संस्थानों की स्वायत्तता जैसे मुद्दे भी उनके भाषण का हिस्सा रहे।

अब देखना होगा कि इस बयान पर केंद्र सरकार और अन्य राजनीतिक दलों की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है और जम्मू-कश्मीर से जुड़े इन मुद्दों पर आगे क्या राजनीतिक घटनाक्रम सामने आता है।