S. Jaishankar का पाकिस्तान को दो टूक संदेश बेहतर रिश्ते चाहते हैं भारत, लेकिन आतंकवाद पर नहीं होगा समझौता

भारत और पाकिस्तान के रिश्तों को लेकर विदेश मंत्री एस. जयशंकर का बयान एक बार फिर चर्चा में है। पाकिस्तान के साथ बेहतर संबंधों की इच्छा जताते हुए उन्होंने स्पष्ट किया है कि किसी भी देश के साथ रिश्ते मजबूत बनाने के लिए सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत की पाकिस्तान नीति में आतंकवाद का मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण बना हुआ है। बालाकोट एयरस्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर जैसे सैन्य अभियानों का उल्लेख करते हुए भारत की सुरक्षा नीति और आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर पहले भी स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत पाकिस्तान के साथ बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद करने के पक्ष में नहीं है, लेकिन बातचीत का मुख्य मुद्दा सीमा पार आतंकवाद होना चाहिए। भारत का कहना है कि सामान्य संबंधों की दिशा में आगे बढ़ने के लिए आतंकवाद के खिलाफ ठोस कार्रवाई आवश्यक है।
पाकिस्तान के साथ बेहतर रिश्ते, लेकिन शर्तों पर स्पष्ट है भारत का रुख
भारत और पाकिस्तान के संबंध लंबे समय से कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। सीमा पार आतंकवाद, जम्मू-कश्मीर से जुड़े विवाद और दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी ने द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित किया है। ऐसे माहौल में बेहतर रिश्तों की बात करना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी उन परिस्थितियों को समझना भी है जिनमें बातचीत आगे बढ़ सकती है।
भारत का रुख रहा है कि पड़ोसी देशों के साथ शांतिपूर्ण संबंध होने चाहिए। व्यापार, क्षेत्रीय सहयोग और लोगों के बीच संपर्क से दोनों देशों को लाभ मिल सकता है। हालांकि, जब सुरक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दे सामने आते हैं, तो सामान्य संबंधों को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
एस. जयशंकर ने पहले भी कहा है कि भारत पाकिस्तान के साथ बातचीत के खिलाफ नहीं है, लेकिन आतंकवाद के मुद्दे को नजरअंदाज करके केवल बातचीत जारी रखना सही रास्ता नहीं होगा। भारत के लिए आतंकवाद से जुड़े मामलों पर चर्चा किसी भी सार्थक संवाद का प्रमुख हिस्सा है।
बालाकोट एयरस्ट्राइक से ऑपरेशन सिंदूर तक, बदली भारत की सुरक्षा नीति
पाकिस्तान के साथ संबंधों की चर्चा में बालाकोट एयरस्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख महत्वपूर्ण माना जाता है। इन अभियानों को भारत की आतंकवाद विरोधी रणनीति और सुरक्षा नीति के संदर्भ में देखा जाता है।
14 फरवरी 2019 को पुलवामा में हुए आतंकी हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 40 जवानों की जान चली गई थी। इसके बाद भारत ने 26 फरवरी 2019 को बालाकोट में हवाई हमला किया। इस कार्रवाई को पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादी ढांचे के खिलाफ भारत की जवाबी कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया गया।
इसके बाद 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले में 26 लोगों की मौत हो गई। इस घटना के बाद भारत ने 7 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। भारत के अनुसार, इस अभियान में पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया गया।
इन घटनाओं ने भारत-पाकिस्तान संबंधों में सुरक्षा के मुद्दे को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया। भारत ने लगातार यह संदेश देने की कोशिश की है कि आतंकवादी हमलों का जवाब देने के लिए उसके पास सैन्य और कूटनीतिक विकल्प मौजूद हैं।
आतंकवाद को लेकर भारत का रुख क्यों है सख्त?
भारत लंबे समय से पाकिस्तान पर सीमा पार आतंकवाद को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाने का आरोप लगाता रहा है। भारतीय नीति निर्माताओं का मानना है कि जब तक आतंकवादी गतिविधियों पर प्रभावी रोक नहीं लगती, तब तक दोनों देशों के बीच विश्वास बहाल करना आसान नहीं होगा।
आतंकवाद का प्रभाव केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहता। इससे व्यापार, पर्यटन, निवेश और क्षेत्रीय स्थिरता भी प्रभावित होती है। दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने पर सीमा क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
भारत की नीति में इसलिए सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाती है। सरकार का कहना रहा है कि बातचीत तभी सार्थक हो सकती है, जब आतंकवाद से जुड़े मुद्दों पर वास्तविक प्रगति हो। भारत और पाकिस्तान के बीच स्थायी शांति की संभावनाएं इसी बात पर निर्भर करती हैं कि दोनों पक्ष सुरक्षा संबंधी चिंताओं को किस तरह संबोधित करते हैं।
भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत का रास्ता कितना आसान?
भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत बहाल करना आसान नहीं है। दोनों देशों के बीच कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर लंबे समय से मतभेद बने हुए हैं। इसके अलावा, आतंकवादी घटनाओं के बाद राजनीतिक और कूटनीतिक माहौल भी प्रभावित होता है।
भारत का कहना है कि द्विपक्षीय मामलों पर बातचीत दोनों देशों के बीच होनी चाहिए और आतंकवाद को मुख्य मुद्दे के रूप में संबोधित किया जाना चाहिए। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मई 2025 में भी स्पष्ट किया था कि पाकिस्तान के साथ बातचीत आतंकवाद से जुड़े विषयों पर केंद्रित होगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए दोनों देशों के बीच विश्वास बहाल करना महत्वपूर्ण होगा। इसके लिए केवल बयान पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि सुरक्षा, आतंकवाद और आपसी संबंधों से जुड़े मुद्दों पर ठोस कदम उठाने की जरूरत होगी।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की कूटनीति का महत्व
भारत-पाकिस्तान संबंध केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं हैं। दक्षिण एशिया की स्थिरता और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी इनका महत्व है। दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें भी इस क्षेत्र पर टिक जाती हैं।
भारत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता उठाता रहा है। भारत की कूटनीतिक कोशिशों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह बताना है कि आतंकवाद के मुद्दे पर वैश्विक स्तर पर स्पष्ट और प्रभावी रुख अपनाया जाना चाहिए।
वहीं, किसी भी सैन्य कार्रवाई के बाद तनाव को नियंत्रित रखना भी उतना ही जरूरी होता है। परमाणु हथियारों से लैस दो पड़ोसी देशों के बीच स्थिरता बनाए रखना क्षेत्रीय शांति के लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए सुरक्षा तैयारियों के साथ-साथ कूटनीतिक संवाद की भूमिका भी बनी रहती है।
आगे क्या होगा भारत-पाकिस्तान संबंधों का भविष्य?
भारत और पाकिस्तान के संबंधों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों देश सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को किस तरह सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ते हैं। भारत की ओर से बेहतर रिश्तों की इच्छा जताई जाती रही है, लेकिन इसके साथ आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई को भी आवश्यक बताया गया है।
एस. जयशंकर के पहले के बयानों से यह संकेत मिलता है कि भारत बातचीत की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं करता, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दे पर समझौता करने के पक्ष में भी नहीं है।
फिलहाल, दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार के लिए विश्वास बहाल करना, आतंकवाद पर प्रभावी कार्रवाई और कूटनीतिक स्तर पर स्पष्टता महत्वपूर्ण होगी। आने वाले समय में पाकिस्तान की ओर से उठाए जाने वाले कदम और भारत की प्रतिक्रिया यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि द्विपक्षीय संबंध किस दिशा में आगे बढ़ते हैं।
भारत और पाकिस्तान के बीच बेहतर संबंधों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन स्थायी शांति के लिए सुरक्षा संबंधी चिंताओं का समाधान जरूरी है। भारत का मौजूदा रुख यही दर्शाता है कि बातचीत की संभावना बनी रह सकती है, पर आतंकवाद के मुद्दे को नजरअंदाज करके संबंधों को सामान्य बनाना आसान नहीं होगा।