‘वाइब’ फिल्म रिव्यू: पहले हाफ में खूब हंसाएगी, दूसरे हाफ में कहानी भटक जाएगी

Kunal Kemmu की ‘वाइब’ में कॉमेडी, दोस्ती, जासूसी और एक्शन का ऐसा मेल देखने को मिलता है, जो शुरुआत में काफी मजेदार लगता है।
कुणाल खेमू एक बार फिर ऐसी फिल्म लेकर आए हैं, जिसमें उनकी कॉमेडी का अंदाज खुलकर देखने को मिलता है। फिल्म ‘वाइब’ की कहानी दो दोस्तों हार्दिक और बग्स के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अचानक एक ऐसे जासूसी मिशन का हिस्सा बन जाते हैं जिसकी उन्होंने शायद कभी कल्पना भी नहीं की होगी। शुरुआत में फिल्म का यही अजीबोगरीब माहौल दर्शकों को खूब हंसाता है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, फिल्म का अंदाज भी बदलने लगता है।
‘वाइब’ में कुणाल खेमू के साथ स्पर्श श्रीवास्तव और प्रीति जिंटा अहम भूमिकाओं में नजर आते हैं। फिल्म में दोस्ती और कॉमेडी के साथ जासूसी मिशन को जोड़ने की कोशिश की गई है। यही प्रयोग फिल्म को बाकी सामान्य कॉमेडी फिल्मों से थोड़ा अलग बनाता है। हालांकि फिल्म की सबसे बड़ी परेशानी भी यहीं से शुरू होती है, क्योंकि दूसरे हिस्से में कहानी अपने शुरुआती मजेदार अंदाज को संभाल नहीं पाती।
कुणाल खेमू ने फिर दिखाया अपना कॉमेडी वाला अंदाज
कुणाल खेमू को कॉमेडी करते देखना दर्शकों के लिए कोई नई बात नहीं है, लेकिन ‘वाइब’ में उनका अंदाज फिर भी कई जगह मजा देता है। हार्दिक के किरदार में वह ऐसे शख्स बने हैं जो मुश्किल परिस्थिति में भी अपनी हरकतों और बातों से माहौल को हल्का कर देता है।
कुणाल की संवाद बोलने की शैली, चेहरे के हावभाव और सही समय पर की गई कॉमेडी फिल्म के कई दृश्यों को मजेदार बना देती है। वह जब स्पर्श श्रीवास्तव के साथ स्क्रीन पर होते हैं तो दोनों की जोड़ी फिल्म को और मनोरंजक बना देती है।
हार्दिक और बग्स की दोस्ती इस फिल्म की सबसे अच्छी चीजों में से एक है। दोनों के बीच होने वाली बातचीत और मुश्किल हालात में उनकी घबराहट कई बार हंसी पैदा करती है। यही वजह है कि फिल्म का पहला हिस्सा दर्शकों को अपने साथ जोड़े रखने में काफी हद तक सफल रहता है।
पहले हिस्से में जमकर मिलती है कॉमेडी
‘वाइब’ का पहला हिस्सा फिल्म का सबसे मजबूत भाग कहा जा सकता है। कहानी यहां बहुत ज्यादा गंभीर होने की कोशिश नहीं करती। दो आम दोस्तों का अचानक जासूसी मिशन में पहुंच जाना अपने आप में एक मजेदार विचार है और फिल्म शुरुआत में इसी का भरपूर फायदा उठाती है।
हार्दिक और बग्स जिस तरह एक के बाद एक अजीब परिस्थितियों में फंसते हैं, उसे देखकर कई जगह हंसी आती है। कहानी को आगे बढ़ाने के साथ-साथ दोनों की दोस्ती और उनकी आपसी नोकझोंक भी चलती रहती है।
फिल्म का पहला हिस्सा इसलिए भी बेहतर लगता है क्योंकि यहां कॉमेडी को कहानी पर हावी नहीं किया गया है। किरदारों की अपनी हरकतों से ही कई मजेदार पल पैदा होते हैं। यही चीज फिल्म को एक हल्की-फुल्की और मनोरंजक शुरुआत देती है।
इंटरवल के बाद कहानी बदल देती है अपना रंग
फिल्म की असली परेशानी इंटरवल के बाद शुरू होती है। जहां पहले हिस्से में दर्शक हार्दिक और बग्स की मस्ती देख रहे होते हैं, वहीं दूसरे हिस्से में जासूसी मिशन ज्यादा गंभीर होने लगता है।
कहानी में नए मोड़ आते हैं, एक्शन बढ़ता है और मिशन का दायरा भी बड़ा हो जाता है। लेकिन इसी दौरान फिल्म का वह मजेदार अंदाज थोड़ा कमजोर पड़ जाता है जिसने शुरुआत में दर्शकों को बांधकर रखा था।
दूसरे हिस्से में फिल्म एक साथ बहुत कुछ करने की कोशिश करती हुई दिखाई देती है। कहीं कॉमेडी है, कहीं एक्शन है तो कहीं जासूसी कहानी को गंभीर बनाने की कोशिश की गई है। इस वजह से कहानी की गति कई जगह असंतुलित लगती है।
ऐसा महसूस होता है कि फिल्म अगर अपनी कहानी को थोड़ा सरल रखती और हार्दिक-बग्स की दोस्ती और कॉमेडी पर ज्यादा ध्यान देती, तो इसका असर और बेहतर हो सकता था।
कॉमेडी और जासूसी के बीच उलझ जाती है ‘वाइब’
‘वाइब’ की कहानी को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि फिल्म एक साथ दो अलग-अलग दुनिया को जोड़ने की कोशिश करती है। एक तरफ यह दो दोस्तों की मजेदार कहानी है और दूसरी तरफ इसमें जासूसी मिशन, खतरा और एक्शन भी है।
पहले हिस्से में कॉमेडी ज्यादा मजबूत दिखाई देती है, इसलिए फिल्म का अंदाज साफ नजर आता है। लेकिन दूसरे हिस्से में जब जासूसी कहानी को ज्यादा महत्व दिया जाता है तो कॉमेडी की वही सहजता कम होने लगती है।
यहीं पर फिल्म अपने नाम वाली हल्की और मजेदार ‘वाइब’ से थोड़ी दूर जाती हुई दिखाई देती है।
प्रीति जिंटा की मौजूदगी ने बढ़ाया आकर्षण
‘वाइब’ में प्रीति जिंटा भी एक अहम भूमिका में नजर आती हैं। फिल्म में उनका किरदार मैडम एच का है, जो जासूसी मिशन से जुड़ा हुआ है।
काफी समय बाद प्रीति जिंटा को इस तरह के बड़े पर्दे वाले प्रोजेक्ट में देखना उनके प्रशंसकों के लिए खास बात है। फिल्म में उनकी मौजूदगी कहानी को एक अलग रंग देती है और जासूसी वाले हिस्से को थोड़ा बड़ा बनाती है।
प्रीति जिंटा के किरदार को अगर और विस्तार दिया जाता तो शायद कहानी में उनका असर और ज्यादा दिखाई देता। फिर भी उनकी स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म के आकर्षण को बढ़ाने का काम करती है।
स्पर्श श्रीवास्तव और कुणाल की जोड़ी बनी जान
‘वाइब’ में स्पर्श श्रीवास्तव का काम भी ध्यान खींचता है। कुणाल खेमू के साथ उनकी जोड़ी फिल्म के मजेदार हिस्सों में काफी अच्छी लगती है।
दोनों के किरदार एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं और यही अंतर कॉमेडी पैदा करता है। जहां हार्दिक कई बार बिना सोचे कुछ कर बैठता है, वहीं बग्स की प्रतिक्रियाएं उन परिस्थितियों को और मजेदार बना देती हैं।
स्पर्श ने अपने किरदार को जरूरत से ज्यादा करने की कोशिश नहीं की है। उनका सहज अभिनय फिल्म की कॉमेडी को स्वाभाविक बनाए रखता है।
‘वाइब’ का संगीत और एक्शन भी कहानी के साथ चलता है
फिल्म में संगीत अमित त्रिवेदी ने दिया है, जबकि बैकग्राउंड स्कोर जॉन स्टीवर्ट एडुरी का है। फिल्म का संगीत उसके आधुनिक और हल्के-फुल्के माहौल के साथ चलने की कोशिश करता है।
एक्शन की बात करें तो ‘वाइब’ खुद को पूरी तरह गंभीर जासूसी फिल्म बनाने की कोशिश नहीं करती। यहां एक्शन के बीच भी कॉमेडी का इस्तेमाल किया गया है। यही वजह है कि फिल्म को पूरी तरह गंभीर जासूसी फिल्म की तरह देखना सही नहीं होगा।
फिल्म का असली मजा उसके उन हिस्सों में है जहां एक्शन के साथ किरदारों की अजीबोगरीब हरकतें भी देखने को मिलती हैं।
क्या ‘वाइब’ में ‘मडगांव एक्सप्रेस’ जैसा मजा है?
कुणाल खेमू की पिछली निर्देशित फिल्म ‘मडगांव एक्सप्रेस’ को मिली लोकप्रियता के बाद ‘वाइब’ की तुलना उससे होना स्वाभाविक है। दोनों फिल्मों में कॉमेडी और अजीब परिस्थितियों में फंसे किरदार देखने को मिलते हैं, लेकिन दोनों की कहानी का अंदाज अलग है।
‘वाइब’ का स्तर थोड़ा बड़ा है और इसमें जासूसी मिशन और एक्शन भी शामिल किया गया है। यही वजह है कि यह फिल्म लगातार उसी तरह की कॉमेडी नहीं दे पाती, जैसी दर्शकों ने ‘मडगांव एक्सप्रेस’ में देखी थी।
अगर आप ‘वाइब’ देखने जा रहे हैं तो इसे कुणाल खेमू की पिछली फिल्म से तुलना करके देखने के बजाय एक अलग कॉमेडी फिल्म के तौर पर देखना बेहतर रहेगा।
फिल्म की सबसे बड़ी कमी कहां है?
‘वाइब’ की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी पटकथा है। फिल्म के पहले हिस्से में कहानी सीधी और मजेदार रहती है, लेकिन दूसरे हिस्से में घटनाएं जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती हैं।
एक के बाद एक नए मोड़ और जटिलताएं कहानी में जुड़ती जाती हैं। इससे फिल्म का वह हल्का-फुल्का माहौल कमजोर पड़ता है जो शुरुआत में इसकी सबसे बड़ी ताकत था।
दूसरे हिस्से में अगर कहानी को थोड़ा छोटा और ज्यादा सीधा रखा जाता तो शायद फिल्म का प्रभाव बेहतर हो सकता था। कई जगह ऐसा लगता है कि फिल्म अपनी कहानी को बड़ा बनाने के चक्कर में उस कॉमेडी से दूर चली गई जिसके लिए दर्शक इसे देखने आए थे।
‘वाइब’ देखनी चाहिए या नहीं?
अगर आपको कॉमेडी फिल्में पसंद हैं और आप जासूसी कहानी को हल्के-फुल्के अंदाज में देखना चाहते हैं, तो ‘वाइब’ आपको मनोरंजन के कई अच्छे पल दे सकती है।
खासकर कुणाल खेमू और स्पर्श श्रीवास्तव की जोड़ी फिल्म में कई ऐसे दृश्य लेकर आती है जहां आप मुस्कुराने और हंसने पर मजबूर हो सकते हैं। फिल्म का पहला हिस्सा इसी वजह से काफी अच्छा लगता है।
लेकिन अगर आप एक बहुत मजबूत और पूरी तरह गंभीर जासूसी कहानी की उम्मीद करके जा रहे हैं तो फिल्म आपकी उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतर सकती। दूसरे हिस्से में कहानी की पकड़ कमजोर होती है और शुरुआत वाला मजा लगातार बना नहीं रहता।
आखिर कैसी है कुणाल खेमू की ‘वाइब’?
कुल मिलाकर ‘वाइब’ एक ऐसी फिल्म है जो शुरुआत में दर्शकों को अपने मजेदार अंदाज से जोड़ लेती है। कुणाल खेमू और स्पर्श श्रीवास्तव की जोड़ी, दोस्ती और कॉमेडी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। प्रीति जिंटा की मौजूदगी भी फिल्म को खास बनाती है।
लेकिन इंटरवल के बाद कहानी जिस तरह कॉमेडी से ज्यादा जासूसी और एक्शन की तरफ बढ़ती है, उसी दौरान फिल्म अपनी पकड़ कुछ हद तक खो देती है।
फिर भी ऐसा नहीं है कि ‘वाइब’ में मनोरंजन नहीं है। फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जो दर्शकों को हंसाते हैं और हल्का-फुल्का मनोरंजन देते हैं। बस समस्या यह है कि फिल्म शुरुआत में जिस स्तर का मजा देती है, उसे अंत तक उसी तरह बनाए नहीं रख पाती।
सीधी बात करें तो ‘वाइब’ कुणाल खेमू की एक मजेदार कोशिश है, जिसमें पहला हाफ दिल जीतता है लेकिन दूसरा हाफ कहानी को थोड़ा उलझा देता है। अगर आप कॉमेडी, दोस्ती और हल्की-फुल्की जासूसी वाली फिल्म देखना चाहते हैं, तो ‘वाइब’ आपके लिए एक बार देखने लायक फिल्म हो सकती है।