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राजनीति

‘सत्ता परिवर्तन तो जरूर होगा!’ प्रशांत भूषण के बयान से गरमाई सियासत, BJP ने भी किया पलटवार

By Aarti Mishra · Published 15 Oct 2026, 18:48 · Updated 15 Oct 2026, 18:48

Prashant Bhushan statement on regime change amid SIR controversy

देश में चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर जारी विवाद के बीच वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के एक बयान ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। उन्होंने खुले तौर पर सत्ता परिवर्तन की इच्छा जाहिर करते हुए सवाल उठाया कि लोकतंत्र में सरकार बदलने की मांग करने में गलत क्या है? उनके इस बयान पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है।यह बयान ऐसे समय आया है, जब दिल्ली में प्रदर्शन करने के अधिकार, जंतर-मंतर की स्थिति और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक टकराव तेज है। इस पूरे घटनाक्रम ने सरकार और विपक्ष के बीच चल रही बहस को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

प्रशांत भूषण ने क्या कहा, जिससे मचा सियासी बवाल?

दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान प्रशांत भूषण ने सत्ता परिवर्तन की मांग का बचाव किया। उन्होंने कहा कि सरकार बदलने की इच्छा रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है और इसे साजिश के तौर पर पेश करना उचित नहीं है।रिपोर्टों के मुताबिक, भूषण ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी खुद भी अतीत में सरकार बदलने की मांग को लेकर आंदोलन करती रही है। ऐसे में अब दूसरों पर सत्ता परिवर्तन की साजिश रचने का आरोप लगाना दोहरे मापदंड को दर्शाता है।उन्होंने यह भी तर्क दिया कि शांतिपूर्ण तरीके से सरकार का विरोध करना और उसकी नीतियों से असहमति जताना अपने आप में अपराध नहीं है। उनके बयान का मुख्य संदेश यही था कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना और राजनीतिक बदलाव की मांग के लिए जगह होनी चाहिए।

SIR विवाद ने क्यों बढ़ाई राजनीतिक गर्मी?

मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR इस समय राजनीतिक बहस का एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों ने इस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। उनकी चिंताओं में मतदाता सूची की पारदर्शिता, पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखने और चुनावी प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा बनाए रखने जैसे मुद्दे शामिल हैं।इसी विवाद के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ भी विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों और विपक्षी नेताओं की ओर से चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं और जवाबदेही की मांग की गई है।हालांकि, इन आरोपों और चिंताओं को अंतिम रूप से साबित हुई अनियमितताओं के बराबर नहीं माना जा सकता। इस मामले में संबंधित संस्थाओं के आधिकारिक पक्ष और उपलब्ध तथ्यों को ध्यान में रखना जरूरी है।

जंतर-मंतर को लेकर भी बढ़ा विवाद

प्रशांत भूषण जिस प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल हुए, उसका एक अहम मुद्दा जंतर-मंतर को दोबारा प्रदर्शन स्थल के रूप में बहाल करने की मांग भी था। इस कार्यक्रम में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके समेत अन्य लोग मौजूद थे।प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान CJP नेताओं आशुतोष रांका और सौरव दास की रिहाई की मांग भी उठाई गई। इन नेताओं से जुड़े मामले और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति का मुद्दा पहले से ही राजनीतिक विवाद का हिस्सा रहे हैं।इससे पहले दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने की जानकारी दी थी। इस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर 15 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा। अब इस मामले में अदालत की आगे की कार्रवाई पर भी नजर रहेगी।

जंतर-मंतर लंबे समय से राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न आंदोलनों के लिए विरोध दर्ज कराने का एक प्रमुख स्थान रहा है। इसलिए इस स्थल की स्थिति को लेकर उठे सवाल केवल एक प्रदर्शन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक विरोध के अधिकार से भी जुड़े हैं।

भाजपा ने प्रशांत भूषण के बयान पर क्या कहा?

प्रशांत भूषण के बयान के बाद भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया ने विपक्षी नेताओं और आंदोलन से जुड़े लोगों पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि इन लोगों का उद्देश्य संविधान की मूल भावना को कमजोर करना और लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाना है।भाजपा की इस प्रतिक्रिया से स्पष्ट है कि सत्ता परिवर्तन और विरोध प्रदर्शन को लेकर दोनों पक्षों की राय अलग-अलग है। जहां प्रशांत भूषण सरकार के खिलाफ शांतिपूर्ण असहमति और राजनीतिक बदलाव की मांग को लोकतांत्रिक अधिकार बता रहे हैं, वहीं भाजपा ने विपक्ष की रणनीति पर सवाल उठाए हैं।इस विवाद में दोनों पक्षों के बयानों को उनके राजनीतिक संदर्भ में देखना जरूरी है। किसी भी आरोप की सत्यता का आकलन तथ्यों, संबंधित पक्षों के जवाब और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

16 अक्टूबर को तिरंगा लेकर जुटने की अपील

इस घटनाक्रम के बीच CJP संस्थापक अभिजीत दिपके ने लोगों से 16 अक्टूबर को शाम पांच बजे दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क में राष्ट्रीय ध्वज लेकर जुटने की अपील की है। इस आह्वान को प्रदर्शन और नागरिक अधिकारों से जुड़ी बहस के अगले घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है।अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस कार्यक्रम को कितना समर्थन मिलता है और प्रशासन की ओर से क्या व्यवस्था की जाती है। साथ ही, जंतर-मंतर को लेकर चल रही कानूनी प्रक्रिया का असर भविष्य में होने वाले विरोध प्रदर्शनों पर भी पड़ सकता है।

आगे क्या होगा? सबकी नजर राजनीतिक घटनाक्रम पर

प्रशांत भूषण के बयान ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना, विरोध प्रदर्शन और सत्ता परिवर्तन की मांग की सीमाएं क्या हैं। इस बहस में संवैधानिक अधिकारों के साथ कानून-व्यवस्था और शांतिपूर्ण विरोध की शर्तें भी महत्वपूर्ण हैं।फिलहाल, SIR विवाद, मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर उठ रहे सवाल और जंतर-मंतर की स्थिति तीनों मुद्दे राजनीतिक चर्चा में बने हुए हैं। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही, संबंधित पक्षों के बयान और 16 अक्टूबर के प्रस्तावित कार्यक्रम पर सबकी नजर रहेगी।प्रशांत भूषण के ‘सत्ता परिवर्तन’ वाले बयान ने राजनीतिक बहस को नया मोड़ दिया है। भाजपा ने इसका जवाब देते हुए विपक्ष पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अब इस पूरे विवाद की दिशा केवल बयानों से नहीं, बल्कि आगे होने वाली कानूनी और राजनीतिक कार्रवाई से भी तय होगी।